IAS प्रारंभिक परीक्षा 2017 के लिए महत्वपूर्ण बिल और संशोधन: शत्रु संपत्ति (संशोधन और वैधता) विधेयक, 2016 और मध्यस्थता और समझौता विधेयक, 2015

IAS प्रारंभिक परीक्षा 2017 के लिए महत्वपूर्ण बिल और संशोधन : संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) इस वर्ष 18 जून 2017 को सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा का आयोजन करेगा। ये देश की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन परीक्षा है। इस परीक्षा में कुल आवेदन भरने वालों में मात्र 0.1-0.3 फ़ीसद के दर से पास होने वाले उम्मीदवारों की इस परीक्षा को पास करना बहुत मुश्किल है।

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ये लेख कुछ बहुत महत्वपूर्ण बिल और संशोधन के बारे में बताएगा जो कि आपको आपकी आगामी परीक्षा में बहुत सहायक होंगे।

IAS प्रारंभिक परीक्षा 2017 के लिए महत्वपूर्ण बिल और संशोधन : शत्रु संपत्ति (संशोधन और वैधता) विधेयक, 2016 और मध्यस्थता और समझौता विधेयक, 2015

आज हम अगले दो बिलों पर चर्चा करेंगे। उल्लेख किया गया है कि अगले दो विषयों के विवरण हैं- ‘शत्रु संपत्ति (संशोधन और वैधता) विधेयक, 2016 और मध्यस्थता और समझौता विधेयक, 2015’।

शत्रु संपत्ति (संशोधन और वैधता) विधेयक, 2016

इस विधेयक का नाम शत्रु संपत्ति (संशोधन और वैधता) विधेयक, 2016 है। यह गृह मंत्रालय के अधीन आता है जो 14 मार्च 2017 को पास किया गया था।

उद्देश्य

यह विधेयक शत्रु संपत्ति अधिनियम, 1968 और लोक परिसर (अनाधिकृत रूप से रहने वालों का निष्कासन) अधिनियम, 1971 को संशोधित करना है। यह शत्रु संपत्ति (संशोधन और वैधता) अध्यादेश, 2016 को प्रस्थापित करेगा।

विधेयक की मुख्य विशेषताएं

केंद्र सरकार ने 1962, 1965 और 1971 के संघर्षों के दौरान कुछ संपत्तियों को पाकिस्तान और चीन की संपत्ति के रूप में नामांकित किया था।

इन संपत्तियों को भारत की शत्रु संपत्ति के संरक्षण में सौंप दिया गया था, जो कि एक केंद्र सरकार के अधीन बना एक कार्यालय है। 1968 अधिनियम, इन शत्रु संपत्ति को नियंत्रित करता है और परिरक्षक की शक्तियां बताता है।

  • पूर्वप्रभावी आवेदन: यह विधेयक 7 जनवरी 2016 से लागू किया जाएगा, जो कि 2016 अध्यादेश के ऐलान की तिथि है। हालांकि, इसके प्रावधानों में से कई 1968 अधिनियम की शुरूआत से लागू होंगे। परिणामस्वरूप, विनिवेश (यानि शत्रु संपत्ति को संरक्षण से उसके मालिक अथवा अन्य व्यक्ति को सौंपना) और शत्रु संपत्ति का प्रतिस्थापन जो कि 7 जनवरी 2016 से पहले हुआ था और विधेयक के उल्लंघन में शामिल हैं, वे व्यर्थ होंगे।
  • शत्रु की परिभाषा: 1968 अधिनियम शत्रु को एक ऐसे देश (और उसके नागरिक) के रूप में परिभाषित करता है जिसने भारत के ख़िलाफ़ (यानि पाकिस्तान और चीन) बाह्य आक्रमण किया हो। यह विधेयक निम्नलिखित बातों के शामिल कर इस परिभाषा को संशोधित करना चाहता है:

(क) शत्रु का कानूनी वारिस फिर भले ही वे भारतीय नागरिक हों या अन्य देश के नागरिक जो शत्रु नहीं है, (ख) शत्रु देश के देशवासी जिन्होंने बाद में अन्य देश की राष्ट्रीयता हासिल की हो आदि।

  • संपत्ति को निहितार्थ करना: 1968 अधिनियम ने पाकिस्तान और चीन से संघर्ष के बाद, शत्रु संपत्ति को परिरक्षक के अधीन निहित किया था। यह विधेयक अधिनियम में संशोधन कर यह स्पष्ट करना चाहता है कि निम्नलिखित परिस्थितियों में भी संपत्तियों को परिरक्षक के अधीन निहित होंगी:

(क) शत्रु की मृत्यु (ख) यदि कानूनी वारिस भारतीय है (ग) शत्रु अपनी राष्ट्रीयता अन्य देश की ग्रहण करता हो आदि। इस विधेयक के अनुसार यदि शत्रु संपत्ति परिरक्षक को सौंपी जाती है तो सभी अधिकार और हित परिरक्षक से निहित होंगे। इन संपत्तियो पर किसी भी कानून या कस्टम बाद में शासन नहीं रह जाएगा।

  • विनिवेश: 1968 अधनियम में केंद्र सरकार द्वारा यह कहा गया कि शत्रु संपत्ति को संरक्षण से उसके मालिक या अन्य किसी व्यक्ति को सौंपा जा सकता है। यह विधेयक इस प्रावधान को प्रतिस्थापित करता है और शत्रु संपत्ति सिर्फ़ मालिक को भी तभी दी जाएगी जब आवेदक सरकार से आवेदन करता है और संपत्ति कोई शत्रु संपत्ति नहीं होनी चाहिए।
  • बिक्री की शक्ति: 1968 अधिनियम में परिरक्षक को शत्रु संपत्ति की बिक्री का अधिकार था सिर्फ़ तभी जब यह संपत्ति की सुरक्षा के उद्देश्य से खरीदी गई हो या दुश्मन और उसके परिवार की भारत में सुरक्षा के लिए। यह विधेयक इस शक्ति को विस्तार देना चाहता है और परिरक्षक को शत्रु संपत्ति की बिक्री या निपटाने की अनुमति प्रदान करता है।
  • शत्रुओं द्वारा स्थानांतरण: 1968 अधिनियम ने शत्रु द्वारा शत्रु संपत्ति के प्रतिस्थापन पर प्रतिबंध लगा दिया था यदि (क) यह लोकहित के लिए खतरा हो (ख) यह परिरक्षक में संपत्ति के निपटाए जाने से बचने के लिए था। यह विधेयक इस प्रावधान को हटाने का प्रयास करेगा और शत्रुओं द्वारा सभी प्रकार के प्रतिस्थापन को प्रतिबंधित करेगा। इसके अलावा, 1968 अधिनियम से पहले हुए प्रतिस्थापन और उसकी शुरूआत के बाद के प्रतिस्थापन को यह व्यर्थ घोषित करता है।
  • अधिकारक्षेत्र की सीमा: यह विधेयक सिविल अदालतों और अन्य प्राधिकरणों को शत्रु संपत्ति के ख़िलाफ़ चल रहे मामलों में या केंद्र सरकार व परिरक्षक द्वारा लिए गए फैसलों के ख़िलाफ़ प्रवेश करने से वर्जित करता है।
  • परिरक्षक / संरक्षक की शक्तियां: 1968 अधिनियम ने परिरक्षक को शत्रु संपत्ति की रक्षा करने और शत्रु व उसके परिवार की देखभाल (यदि वे भारत में हैं तो) करने के लिए अधिकृत किया है, उस आय से जो कि संपत्ति से प्राप्त होती है। यह विधेयक शत्रु और उसके परिवार के संरक्षण का नियम निरस्त करना चाहता है। इसके अलावा, ऊपर उल्लिखित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अधिनियम परिरक्षक को कुछ उपाय (बिक्री, बंधक या शत्रु संपत्ति को पट्टे पर देना) करने की अनुमति प्रदान करता है।

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अब हम पहले विषय के विस्तार को विराम देंगे और अगले विषय यानि, मध्यस्थता और समझौता (संशोधन) विधेयक, 2015 टॉपिक के बारे में चर्चा करेंगे।

मध्यस्थता और समझौता विधेयक, 2015

इस विधेयक का नाम मध्यस्थता और समझौता (संशोधन) विधेयक, 2015 है। यह कानून और न्याय मंत्रालय के अधीन आता है जो कि पास किया जा चुका है।

उद्देश्य

इस विधेयक का उद्देश्य मध्यस्थता और समझौता अधिनियम, 1996 को संशोधित करना है।

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विधेयक की मुख्य विशेषताएं

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता मामलों के लिए प्रासंगिक अदालत:

  • अधिनियम के तहत्, मध्यस्थता के सभी मामलों के लिए प्रासंगिक अदालत एक प्रधान अदालत या उच्च न्यायालय होगी वो भी वास्तविक अधिकार क्षेत्र के साथ।
  • यह विधेयक इसे संशोधति करता है ये कहने के लिए कि अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता मामलों में कोई प्रासंगिक उच्च न्यायालय ही प्रासंगिक अदालत होगी।

अंतर्राष्ट्रीय व्यवसायिक मध्यस्थता में कुछ प्रावधानों की प्रयोज्यता:

  • अधिनियम के भाग 1 के कुछ प्रावधान सिर्फ़ वहीं लागू होते थे जहां मध्यस्थता का स्थान भारत था। उन प्रावधानों में न्यायालय द्वारा पास किए गए अंतरिम आदेश, मध्यस्थता न्यायाधिकरण के आदेश, अपीलीय आदेश आदि शामिल हैं।
  • इस विधेयक के अधीन, ये प्रावधान अंतर्राष्ट्रीय व्यवसायिक मध्यस्थता मे भी लागू किए जाएंगे यदि मध्यस्थता का स्थान भारत से बाहर है। यह तब तक लागू होगा जब तक पार्टियां अन्यथा सहमत नहीं होतीं।

यदि समझौता होता है तो किसी एक पार्टी के पक्ष में दाखिल होने की अदालत की शक्तियां

  • अधिनियम के अनुसार, यदि अदालत में आया मामला मध्यस्थता समझौता का है तो पार्टियों को मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा।
  • विधेयक के अनुसार, मध्यस्थता की शक्ति अदालत द्वारा प्रयोग में लाई जानी चाहिए फिर भले ही वह पिछली अदालत के फैसले के विपरीत हो। अदालत को पार्टियों को मध्यस्थता के लिए भेजना चाहिए जब तक उन्हें लगता है कि वैध मध्यस्थता नहीं हो सकती।

अदालत द्वारा अंतरिम आदेश:

  • अधिनियम के अनुसार, मध्यस्थता की पार्टी अदालत में अंतरिम छूट के लिए आवेदन कर सकती है लेकिन मध्यस्थता समाप्त होने से पहले। उदाहरण के लिए, एक पार्टी सामान, मात्रा, संपत्ति आदि की अंतरिम सुरक्षा की मांग कर सकती है जो मध्यस्थता से संबंधित हो।
  • यह विधेयक इस प्रावधान को संशोधित करने की मांग करता है और यह कहता है कि यदि अदालत मध्यस्थता कार्रवाई शुरू होने से पहले ही ऐसे अंतरिम आदेश पास करती है तो पारित आदेश के 90 दिनों के अंदर-अंदर ही कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए या अदालत द्वारा निर्धारित समय में। इसके अलावा, अदालत को ऐसे आवेदन तब तक स्वीकार नहीं करने चाहिए जब तक उसे यह नहीं लगता कि मध्यस्थता न्यायाधिकरण कोई समान उपाय देने में असमर्थ है।

पुरस्कार को चुनौती देने के लए लोक नीति का आधार:

  • अधिनियम, अदालत को मध्यस्थता पुरस्कार को हटाने की अनुमति देता है यदि भारतीय लोक नीति के साथ संघर्ष करती प्रतीत होती है। इसमें शामिल पुरस्कार निम्नलिखित द्वारा प्रभावित हो सकते हैं: (क) धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार और (ख) अधिनियम में साक्ष्य प्रावधानों की स्वीकार्यता और गोपनीयता का उल्लंघन करने वाले।
  • यह विधेयक इस प्रावधान को संशोधित कर निम्नलिखित पुरस्कार शामिल करता है: (क) भारतीय कानून की मूलभूत नीति के साथ उल्लंघन में (ख) अधिनियम में दर्ज आधारों पर नौतिकता और न्याय के विचारों में संघर्ष के दौरान।

मध्यस्थों की नियुक्ति:

  • अधिनियम पार्टियों को मध्यस्थों की नियुक्ति करने की अनुमति प्रदान करता है। यदि 30 दिनों के अंदर वे मध्यस्थ चुनने में असमर्थ होते हैं तो मामला अदालत में लाया जाता है ताकि ऐसी नियुक्तियां की जा सकें।
  • यह विधेयक कहता है कि, इस स्तर पर, अदालत को स्वयं को वैध मध्यस्थता समझौते की उपस्थिति की परीक्षा तक सीमित कर लेना चाहिए।

मध्यस्थता पुरस्कारों के लिए समय सीमा:

  • यह विधेयक एक ऐसे प्रावधान का परिचय कराता है जिसे चाहिए कि मध्यस्थता न्यायाधिकरण 12 महीनों के अंदर ही पुरस्कार घोषित कर दे। यह 6 महीने की अवधि तक टाला जा सकता है। यदि कोई पुरस्कार 6 महीनों के अंदर बना लिया जाता है तो, मध्यस्थता न्यायाधिकरण को अतिरिक्त शुल्क प्राप्त होगा। यदि निर्धारित समय से ज़्यादा समय लगता है तो मध्यस्थों का शुल्क 5 फ़ीसद प्रति महीने घटा दिया जाएगा।

अदालत द्वारा मामलों को निपटाने की समयावधि:

  • विधेयक के अनुसार, मध्यस्थता पुरस्कार को किसी भी प्रकार की चुनौती जो कि अदालत द्वारा निर्धारित किया गया है, एक वर्ष की अवधि के अंदर निपटाई जानी चाहिए।
  • मध्यस्थता के लिए शीघ्र गति की प्रक्रिया: विधेयक पार्टियों को शीघ्र गति से मध्यस्थता की कार्रवाई करने की अनुमति प्रदान करता है। पुरस्कार 6 महीने के अंदर दे दिया जाएगा।

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