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CTET परीक्षा 2018: अब्राहम मास्लो का अभिप्रेरणा सिद्धांत

CTET परीक्षा 2018: अब्राहम मास्लो का अभिप्रेरणा सिद्धांत : केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (CTET) का आयोजन, केंद्र सरकार के स्कूलों जैसे-NVS /KVS / तिब्बती विद्यालयों में उम्मीदवारों की शिक्षक के रूप में भर्ती के लिए, केन्द्रीय माध्यमिक माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा किया जाता है। यह प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाली एक अखिल भारतीय स्तर की प्रवेश परीक्षा है।

CTET 2018 की परीक्षा 9 दिसंबर को आयोजित की जानी है। बहुत से CTET उम्मीदवारों ने इसके लिए तैयारी पूर्ण कर ली होगी और अपने तैयारी की जांच कर रहे होंगे। आज हम अभिप्रेरणा सिद्धांत के तहत सबसे महत्पूर्ण और आवश्यक सिद्धांत की बात करेंगे। यह सिद्धांत कई सिद्धांतों की जननी है और आगे आने वाले कई मनोवैज्ञानिकों ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन इस सिद्धांत को ही आधार बना कर किया है। वह सिद्धांत है मास्लो का अभिप्रेरणा सिद्धांत, जिसका प्रतिपादन अब्राहम मस्लोव ने किया था।

CTET परीक्षा 2018: अब्राहम मास्लो का अभिप्रेरणा सिद्धांत

अभिप्रेरणा लक्ष्य-आधारित व्यवहार का उत्प्रेरण या उर्जाकरण है। अभिप्रेरणा या प्रेरणा आंतरिक या बाह्य हो सकती है। इस शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर इंसानों के लिए किया जाता है, लेकिन सैद्धांतिक रूप से, पशुओं के बर्ताव के कारणों की व्याख्या के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। इस आलेख का संदर्भ मानव अभिप्रेरणा है। विभिन्न सिद्धांतों के अनुसार, बुनियादी ज़रूरतों में शारीरिक दुःख-दर्द को कम करने और सुख को अधिकतम बनाने के मूल में अभिप्रेरणा हो सकती है, या इसमें भोजन और आराम जैसी खास ज़रूरतों को शामिल किया जा सकता है; या एक अभिलषित वस्तु, शौक, लक्ष्य, अस्तित्व की दशा, आदर्श, को शामिल किया जा सकता है, या इनसे भी कमतर कारणों जैसे परोपकारिता, नैतिकता, या मृत्यु संख्या से बचने को भी इसमें आरोपित किया जा सकता है।

मास्लो का जन्म रूढ़िवादी जैविस परिवार में न्यूयार्क में हुआ। उन्होंने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से सन् 1934 में मनोविज्ञान विड्ढय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। ‘मानवतावादी मनोविज्यान’ नामक इस सिद्धान्त के विकास में अस्तित्ववादी मनोविज्ञान का भी योगदान है। अस्तित्ववाद एवं मानवतावाद दोनों व्यक्ति की मानवीय चेतना, आत्मगत अनुभूतियां एवं उमंग तथा व्यक्तिगत अनुभवों की व्याख्या करते हो और उसे विश्व से जोड़ने का प्रयत्न करते हैं। मास्लो के इस सिद्धान्त में यह धारणा है कि अभिप्रेरणाएं समग्र रूप से मनुष्य को प्रभावित करती है। इसी धारणा के आधार पर मास्लो ने प्रेरणा के पदानुक्रम सिद्धान्त को प्रतिपादित किया।

मानवतावादी सिद्धान्त के मनोवैज्ञानिकों ने मानव व्यवहार एवं पशु व्यवहार में सापेक्ष अंतर माना है। ये व्यवहारवाद का इसलिए खण्डन करते हैं कि व्यवहारवाद का प्रारम्भ ही पशु व्यवहार से होता है। मास्लो एवं उनके साथियों ने मानव व्यवहार को सभी प्रकार के पशु व्यवहारों से भिन्न माना। इसलिए उन्होंने पशु व्यवहार की मानव व्यवहार के साथ की समानता को अस्वीकार किया। उन्होंने मानव व्यवहार को समझने के लिए पशुओं पर किये जाने वाले शोध कार्यों का खण्डन किया क्योंकि पशुओं में मानवोचित गुण जैसे आदर्श, मूल्य, प्रेम, लज्जा, कला, उत्साह, रोना, हंसना, ईर्ष्या, सम्मान तथा समानता नहीं पाये जाते। इन गुणों का विकास पशुओं में नहीं होता और विशेष मस्तिष्कीय कार्य जैसे कविता, गीत, कला, गणित आदि कार्य नहीं कर सकते। मानवतावादियों ने मानवीय व्यवहार की व्याख्या में मानव के अंतरंग स्वरूप पर विशेष बल दिया। उनके अनुसार व्यक्ति का एक अंतरंग रूप है जो कुछ मात्रा में उसके लिए स्वाभाविक, स्थाई तथा अपरिवर्तन्यील है। इसके अतिरिक्त उन्होंने मानव की सृजनात्मक क्रियाओं को व्यिष्ट क्रियाएं माना है। मास्लो तथा अन्य मानवतावादियों का यह विचार है कि अन्य सिद्धान्तों में मनोवैज्ञानिकों द्वारा मनुष्य के व्यवहार का अध्ययन करने में किसी ऐसे पक्ष का वर्णन नहीं किया, जो पूर्ण स्वस्थ मानव के प्रकार्य, जीवन पद्धति और लक्ष्यों का वर्णन कर सके। मास्लो का यह विश्वास था कि मानसिक स्वास्थ्य का अध्ययन किए बिना व्यक्ति की मानसिक दुर्बलताओं का अध्ययन करना बेकार है। मास्लो (1970) ने कहा कि केवल असामान्य, अविकसितों, विकलांगों तथा अस्वस्थों का अध्ययन करना केवल ‘विकलांग’ मनोविज्ञान को जन्म देना है। उन्होंने मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ एवं स्व-वास्तवीकृत व्यक्तियों के अध्ययन पर अधिक बल दिया। अतः मानवतावादी मनोविज्ञान में ‘आत्मपरिपूर्ण (Self-fulfillment) को मानव जीवन का मूल्य माना है।

अभिप्रेरणा के व्यापक रूप से चर्चित होने वाले सिद्धांतों में से एक अब्राहम मास्लो का सिद्धांत है।

सिद्धांत का सारांश इस तरह प्रकट किया जा सकता है:

  • मनुष्य की कुछ जरूरतें और इच्छाएं है जो उसके बर्ताव या आचरण को प्रभावित करती हैं। केवल पूरी न होनेवाली जरूरत ही व्यवहार को प्रभावित करती हैं, न कि पूरी हो जानेवाली जरूरत।
  • चूंकि जरूरतें अनेक होती हैं इसलिए इनकी प्राथमिकता मूलभूत जरूरतों से लेकर जटिल तक, क्रमानुसार उनके महत्व के आधार पर तय होती हैं।
  • निम्न स्तर की ज़रूरत अगर न्यूनतम संतुष्टि दे जाती हैं तो व्यक्ति अपनी अगली जरूरत की ओर कदम बढ़ाता है।
  • पदानुक्रम की और ज्यादा प्रगति से एक व्यक्ति अधिक व्यक्तिपरकता, मानविकता और मनोवैज्ञानिक स्वस्थता दिखाएगा।

जरूरतों की सूची मूलभूत (बिलकुल निम्न) से लेकर सबसे जटिल तक इस प्रकार है:

  • शारीरिक
  • सुरक्षा
  • तादात्मिकता या सम्बन्ध
  • आत्मसम्मान
  • स्व प्रत्यक्षीकरण

शारीरिक जरुरत

  • शारीरिक ज़रूरत मानव अस्तित्व के लिए जरुरी आवश्यकताएं हैं। यदि ये आवश्यकताएं पूरी नहीं हुई हैं तो कोई भी मानव संभवतः उचित रूप से कार्य नहीं करेगा और वह अपने लक्ष्य में सफल नहीं हो सकता। शारीरिक आवश्यकताओं को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है अतः इनकी पूर्ति सबसे पहले होनी चाहिए। मनुष्यों और सभी जानवरों में अपने जीवन को बनाए रखने के लिए वायु, पानी और भोजन आदि बुनियादी जरुरत है। इसके अतिरिक्त कपड़े, शरणस्थली व्यक्तियों को प्रकृति से सुरक्षा प्रदान करते हैं और मानव यौन व्यवहार जीवन दर को बनाए रखने के लिए भी परम आवश्यक मन गया है।

सुरक्षा जरुरत

प्रायः जब किसी व्यक्ति की शारीरिक ज़रूरतें अपेक्षाकृत पूरी हो जाती हैं, तो उनकी सुरक्षा की आगे आने लगती हैं और उनके व्यवहार में यह दिखाई पड़ने लगती हैं।

सुरक्षा और सुरक्षा की जरूरतों में शामिल हैं:

  • व्यक्तिगत सुरक्षा
  • वित्तीय सुरक्षा
  • स्वास्थ्य और भलाई
  • दुर्घटना / बीमारी और उनके प्रतिकूल प्रभावों के खिलाफ सुरक्षा निवारण

तादात्मिकता या सम्बन्ध

शारीरिक और सुरक्षा आवश्यकता की पूर्ति के पश्चात मानव जरूरत के तीसरे स्तर पर तादात्मिकता या सम्बन्ध भावनाओं को शामिल किया जाता है। जिसे तीन भागों में बाँट सकते हैं-

  • दोस्ती
  • परिवार
  • अंतरंगता या सामाजिक सम्बन्ध
  • मास्लो के अनुसार, मनुष्यों अपने सामाजिक समूहों के मध्य अपने सम्बन्ध की स्वीकृति की भावना महसूस करता है- भले ही ये समूह बड़े या छोटे हों। उदाहरण के लिए, कुछ बड़े सामाजिक समूहों में क्लब, सह-कार्यकर्ता, धार्मिक समूह, पेशेवर संगठन, खेल टीम और गिरोह शामिल हो सकते हैं।
  • छोटे सामाजिक संबंधों के कुछ उदाहरणों में परिवार के सदस्यों, अंतरंग साझेदार, संरक्षक, सहकर्मियों और विश्वासपात्र शामिल हो सकते हैं। मनुष्य की आतंरिक चाह प्यार देने और प्यार करने की होती है, वह चाहता है की लोग उसे महत्त्व दें।

आत्मसम्मान

  • सभी मनुष्यों में आत्म-सम्मान की भावना निहित होती है। इस स्तर पर प्रत्येक मनुष्य की यह भावना होती है कि समाज में उसे स्वीकृति मिले और लोग उसे सहज भाव में स्वीकार करें। उसके मूल्य को स्वीकारा जाय। लोग को अक्सर दूसरों से सम्मान की आवश्यकता होती है। वे ख्याति या महिमा की तलाश करते हैं। हालांकि यह सत्य है कि प्रसिद्धि या महिमा व्यक्ति के  स्वयं-आत्म-सम्मान को निर्मित नहीं करती जब तक कि वह स्वीकार न करे कि वे आंतरिक रूप से कौन हैं?  मास्लो ने सम्मान की जरूरतों के तहत दो संस्करणों का उल्लेख किया: एक “निचला” संस्करण और “उच्च” संस्करण।
  • सम्मान के “निचले” संस्करण दूसरों से सम्मान की आवश्यकता है। इसमें मनुष्य की स्थिति, मान्यता, प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा और लोगों द्वारा ध्यान देने की आवश्यकता शामिल हो सकती है।
  • “उच्च” संस्करण आत्म-सम्मान की आवश्यकता के रूप में प्रकट होता है उदाहरण के लिए, व्यक्ति की शक्ति, क्षमता, स्वामित्व, आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और स्वतंत्रता की आवश्यकता हो सकती है। यह “उच्च” संस्करण “निचले” संस्करण पर प्राथमिकता लेता है क्योंकि यह अनुभव के माध्यम से स्थापित किसी आंतरिक क्षमता पर निर्भर करता है।
    इसके बाद के स्तर में ज्यादा अंतर प्रकट नहीं होता इसके बजाय, स्तर का निकटतम सम्बन्ध देख जा सकता है।

स्व-प्रत्यक्षीकरण

  • एक आदमी क्या हो सकता है उसे वही होना चाहिए। जरूरत के इस स्तर को संदर्भित करता है कि एक व्यक्ति की पूर्ण क्षमता क्या है और उसकी संभावित प्राप्ति क्या है? मास्लो इस स्तर पर यह वर्णित करता है कि आदमी जो कर रहा है और जो करना चाहता है वह महत्पूर्ण होता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति के पास आदर्श आदर्श बनने की तीव्र इच्छा हो सकती है। दूसरे में एथलेटिक के रूप की इच्छा हो सकती है। तीसरे में, यह पेंटिंग, चित्र या आविष्कारों में व्यक्त करने की इच्छा हो सकती है। मास्लो का मानना था कि इस स्तर की आवश्यकता को समझने के लिए, व्यक्ति को केवल पिछली जरूरतों को प्राप्त नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें मास्टर करना चाहिए।

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