IAS मुख्य परीक्षा GS पेपर-1 के 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | भाषाई राज्य का गठन और एकता

IAS मुख्य परीक्षा GS पेपर-1 के 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | भाषाई राज्य का गठन और एकता- IAS मुख्य परीक्षा 2017  के लिए उत्तर लेखन के अभ्यास से बहुत मदद मिलती है। इससे पता चल जाता है कि कैसे अपने समय को विभिन्न प्रश्नों के लिए वितरित किया जाए और कैसे बिंदुओं पर प्रकाश डाला जाए, जिससे अधिक अंक प्राप्त किये जा सकें।

उत्तर-लेखन प्रक्रिया का सबसे पहला चरण यही है कि उम्मीदवार प्रश्न को कितने सटीक तरीके से समझता है तथा उसमें छिपे विभिन्न उप-प्रश्नों तथा उनके पारस्परिक संबंधों को कैसे परिभाषित करता है? सच तो यह है कि आधे से अधिक अभ्यर्थी इस पहले चरण में ही गंभीर गलतियाँ कर बैठते हैं। अतः इससे बचने की जरुरत है।

 

IAS मुख्य परीक्षा GS पेपर-1 के 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | टॉपिक – 8

आज हम 8वें टॉपिक पर चर्चा करेंगे। आइये अब हम कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं के माध्यम से इस टॉपिक को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं।

प्रश्न : भाषाई राज्यों के गठन ने भारतीय एकता के कारण को मजबूत किया है ? विमर्श कीजिए। 

उत्तर : राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया के संदर्भ में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका की बात को आज सब समान रूप से स्वीकार करने लगे हैं। यह बात इसलिए भी महत्व की है कि भाषा अगर एक ओर राष्ट्रीय एकीकरण का महत्त्वपूर्ण उपादान बन सकती है तो वहीं दूसरी ओर वह समाज में तनाव द्वंद, विद्वेष और विघटन की प्रवृत्ति को भी जन्म दे सकती है। अतः यह आवश्यक है कि राज्यों के गठन में भाषा की इस दुहरी संभावना के प्रति हम सजग भाव से समझें और एक ऐसी नीति को अपनाएं जो देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में सहायक हो, और वह हमारी बहुभाषिक यर्थाथता के अनुकूल हो और जो राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया में साधक हो।

पक्ष में विचार

  1. भाषाई आधार पर राज्य निर्माण के समर्थकों का यह तर्क है कि यदि भाषा के आधार पर राज्य का गठन किया गया तो प्रतिनिधि संस्थाएं भली प्रकार कार्य करेंगी और प्रजातंत्र के आदर्श सही रूप से क्रियान्वित किये जा सकेंगे।
  2. भाषा पर आधारित राज्य में एकरूपता रहेगी और यह एकरूपता प्रजातंत्र के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। प्रजातंत्र की विभिन्न संस्थाएं जैसे राजनीतिक दल, व्यवस्थापिक, कार्यपालिका सजग और संगठित जनमत आदि एक भाषा होने पर अपने निश्चित लक्ष्यों को प्राप्त कर पाते हैं। इस प्रकार भाषा के आधार पर बनाए गए राज्य प्रजातंत्र के सफल संचालन में सहयोगी बंटे हैं।
  3. भाषाई आधार एक राज्य को शक्तिशाली आधार प्रदान करता है। एक भाषा के कारण सरकार की नीतियाँ जनसमर्थन प्राप्त कर पाती है। विभिन्न भाषा का प्रयोग होने पर केवल एक भाषा वाले व्यक्ति ही सरकारी नीतियों के पक्ष में रहते हैं जबकि दूसरी भाषा बोलने वाले उसका विरोध करते हैं। फलतः राज्य कमजोर होता है। बहुभाषी राज्य में भेदभाव, तिरस्कार, पक्षपात आदि का बोलबाला हो जाता है। एक समुदाय के हितों के लिए अन्य समूह के हितों का बलिदान करने की नीति अपनाई जाती है।
  4. राज्य की भाषा होने पर प्रशासन सशक्त तथा कार्यकुशल बनता है। जनप्रतिनिधियों के मध्य सम्पर्क भाषा समान होने पर संबंधों में प्रगाढ़ता आती है तथा परस्पर विश्वास एवं समझ में भी वृद्धि होती है। लोकतंत्र में प्रशासन की सफलता जनता के व्यापक समर्थन पर निर्भर करती है और यह समर्थन तभी प्राप्त हो सकेगा जबकि जनसंपर्क एवं प्रशासन की भाषा एक ही हो।
  5. भाषा पर आधारित राज्य स्थापित किये जाने से सम्बंधित भाषा के लिए नीतियों का निर्माण, लेखकों और साहित्यकारों को प्रोत्साहन के साथ जनता में भाषा विकास को लेकर एक सकारात्मकता रहती है।
  6.  शिक्षा का माध्यम बनकर यह ज्ञान के प्रति बच्चों में रुझान पैदा करती है और विभिन्न विषयों की व्यापक समझ भी विकसित करती है। जबकि अन्य भाषा एक अवरोध की तरह व्यवहार करती है।
  7. वस्तुतः भाषा केवल सांस्कृतिक विकास का ही आधार नहीं है वरन वह अपने उपयोगकर्ताओं के राजनीतिक तथा आर्थिक स्वार्थों से भी सम्बन्ध रखती है और प्रयाप्त सफलतापूर्वक शासन का संचालन भी सुनिश्चित करती है।

विपक्ष में विचार

  1. भाषा के आधार पर छोटे-छोटे राज्यों की रचना होने के कारण क्षेत्रीय भावनाएं बढ़ती है। प्रत्येक भाषा-भाषी समुदाय पृथक प्रांतीय रूप प्रदान करने हेतु देश की एकता तथा संगठित शक्ति पर कुठाराघात करते हैं। नागालैंड की मांग ऐसी ही प्रवृत्ति के रूप में देखी जा सकती है। संकुचित स्वार्थों के आधार पर की जा रही मांग के परिणामस्वरुप राष्ट्रीय और भावनात्मक एकता के खतरे परिलक्षित होते हैं और बहुत सम्भावना यह भी बनती है कि देश में अनेक राष्ट्रीयता पनपने लगती है और जनता भाषा के गर्व में राष्टीय सामान्यताओं को भुला देती है।
  2. भाषाई राज्य को केंद्र और राज्यों के बीच स्थित संबंधों की दृष्टि से भी समस्याप्रद माना जाता है। केंद्र और राज्य इकाईयों के प्रशासनिक संबंधों में समस्या उठ खड़ी होती है। केंद्र सरकार को राज्य सरकार से पत्र व्यवहार, सूचना प्रसारण में समस्या खड़ीं होती है। प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन कठिन हो जाता है साथ ही अखिल भारतीय नेतृत्व विकसित नहीं होती। भाषाई राज्य क्षेत्र की जनता राज्य क्षेत्र को पूर्णतः अपना मानने लगती है इससे राज्य के अल्पसंख्यकों और दूसरे राज्य में रहने वाले लोगों के साथ अपनत्व की भावना शिथिल पढने लगती हैं। यह सिमित भावना एक दिन पूर्ण स्वत्रंत्रता की मांग में भी परिणित हो सकती है।
  3.  भाषाई राज्यों की स्थापना द्वारा यदि क्षेत्रीय भावनाओं को प्रोत्साहन दिया गया तो यह समस्या का समाधान नहीं वरन अनेक नई समस्याओं को जन्म देगा। असम में बोडोलैंड और उत्तर प्रदेश को तीन राज्यों में बांटने की मांग जोर पकड़ेगी। गुजरात में पिछड़ी जातियों जैसे डॉग और डबला द्वारा अलग राज्य की मांग तो मध्यप्रदेश में महाकौशल और बुंदेलखंड तथा आन्ध्र में रायल सीमा की मांग बलवती होगी।

निःसंदेह, प्रमुख भाषाओं को समाहित करने की नीति ने राष्ट्रीय एकता को मज़बूत किया है। सभी भाषा को सामान आदर दिया गया जिससे हमारी राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिला। राज्य की दृष्टि में कोई भी भाषा निम्न कोटि की नहीं है। यह निसंदेह हमारी राष्ट्रीय एकता की मज़बूती की तरफ एक सरहानीय कदम है। यद्धपि हमारी राष्ट्रीय भाषा हिंदी है परन्तु इसे गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों पर थोपा नहीं गया। अतः कोई भी इससे असंतुष्ट नहीं है। सरकार ने एक विशेष भाषा के भाषायी वर्चस्व से राज्य को बचाने के लिए एवं आधिकारिक उद्देश्यों के लिए हिंदी के साथ अंग्रेजी का उपयोग ज़ारी रखने पर सहमति प्रकट की है।

 

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