IAS मुख्य परीक्षा के GS पेपर-2 के लिए 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | बाल मजदूरी को खत्म करने में आईएलओ की भूमिका

IAS मुख्य परीक्षा के GS पेपर-2 के लिए 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स| बाल मजदूरी को खत्म करने में आईएलओ की भूमिका : संघ लोक सेवा आयोग अक्टूबर के महीने में सिविल सेवा मुख्य परीक्षा का आयोजन करेगा। इस परीक्षा का उद्देश्य एक छात्र को परखने से है जो शासन, संविधान, राजनीति, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की समझ के आधार से संबंधित है।

समस्या यह है कि चाहे कितनी ही अच्छी तैयारी कर ली जाए और भले ही कितना ज्ञान अर्जित कर लिया जाए फिर भी परीक्षा को लेकर हमेशा अनिश्चितता का भय रहता ही है। इस डर पर काबू पाने के लिए, IAS मुख्य परीक्षा के GS पेपर-2 के लिए 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स आपसे साझा कर रहे हैं, जिससे आप इन टॉपिक्स पर अपनी पकड़ मजबूत कर पाएं और आप परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।

IAS मुख्य परीक्षा के GS पेपर-2 के लिए 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स| बाल मजदूरी को खत्म करने में आईएलओ की भूमिका

आज हम अगले टॉपिक पर चर्चा करेंगे। उल्लेखित टॉपिक का स्पष्टीकरण नीचे दिया गया है।

बाल मजदूरी

बाल मजदूरी का मतलब ऐसे कार्य से है जिसमे की कार्य करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित आयु सीमा से छोटा होता है। इस प्रथा को कई देशों और अंतर्राष्ट्रीय संघटनों ने शोषित करने वाली माना है। अतीत में बाल मजदूरी का कई प्रकार से उपयोग किया जाता था, लेकिन सार्वभौमिक स्कूली शिक्षा के साथ औद्योगीकरण, काम करने की स्थिति में परिवर्तन तथा कामगारों श्रम अधिकार और बच्चों अधिकार की अवधारणाओं के चलते इसमे जनविवाद प्रवेश कर गया। बाल मजदूरी अभी भी कुछ देशों में आम है।

बाल श्रम तब होता है जब 15 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति काम कर रहा हो जो उन्हें उनके बचपन, उनकी क्षमता और उनकी गरिमा से वंचित कर रहा है – जब काम उनके शारीरिक और मानसिक विकास को नुकसान पहुंचा रहा है। जब एक बच्चे को स्कूल छोड़ने या स्कूली शिक्षा और काम को गठबंधन करने या जब वे काम कर रहे हैं, जैसे वे बीमार हो रहे हैं – यह बाल श्रम माना जाता है।

बाल श्रम के सबसे चरम और घृणित रूपों में बाल गुलामी, कठिन परिश्रम, वेश्यावृत्ति और विकृति शामिल है। इन बच्चों में से ज्यादातर कृषि और कपड़ा क्षेत्रों, कारखानों, खनन कंपनियों और घरों में काम करते पाए जा सकते हैं। कंपनियां उन्हें कम वेतन के लिए रोजगार देती हैं।

UNICEF ने बाल मजदूरी को 3 श्रेणियों में विभाजित किया है:

  1. परिवार के साथ – बच्चे घर के कार्यों में बिना किसी वेतन के लगे होते हैं।
  2. परिवार के साथ पर घर के बाहर – उदाहरण के लिए, कृषि मजदूर, घरेलू मजदूर, सीमान्त मजदूर आदि।
  3. परिवार से बाहर – उदाहरण के रुप में, व्यवसायिक दुकानों जैसे: होटलों में बच्चों से कार्य कराना, चाय बेचने का कार्य कराना, वैश्यावृति आदि।

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भारतीय अर्थव्यवस्था: सिविल सेवा परीक्षा के लिए सफल मार्गदर्शिका – रमेश सिंह

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बाल मजदूरी को खत्म करने में आईएलओ (अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन) की भूमिका

परिचय

यद्यपि इस संगठन (अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन) की स्थापना 1919 ई. में हुई, तथापि उसका इतिहास औद्योगिक क्रांति के प्रारंभिक दिनों से ही आरंभ हो गया था, जब नवोत्थित औद्योगिक सर्वहारा वर्ग ने समाज की उत्क्रांतिमूलक शक्तिमान संस्था के रूप में तत्कालीन समाज के अर्थशास्त्रियों के लिए एक समस्या उत्पन्न कर दी थी। यह औद्योगिक सर्वहारा वर्ग के कारण न केवल तरह-तरह के उद्योग-धंधों के विकास में अतीव मूल्यवान सिद्ध हो रहा था, बल्कि श्रम की व्यवस्थाओं और व्यवसायों के तीव्रगतिक केंद्रीकरण के कारण असाधारण शक्ति संपन्न होता जा रहा था। फ़्राँसीसी राज्य क्रांति, साम्यवादी घोषणा के प्रकाशन, प्रथम और द्वितीय इंटरनेशनल की स्थापना और एक नए संघर्ष निरत वर्ग के अभ्युदय ने विरोधी शक्तियों को इस सामाजिक चेतना से लोहा लेने के लिए संगठित प्रयत्न करने को विवश किया।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ में तीन संस्थाएँ हैं-

  1. साधारण सम्मेलन (जेनरल कॉन्फ्रसें)
  2. शासी निकाय (गवर्निंग बॉडी)
  3. अंतरराष्ट्रीय श्रम कार्यालय

सदस्य राष्ट्र

साधारण सम्मेलन अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के नाम से अधिक विख्यात है। शासी निकाय संघ की कार्यकारिणी के रूप में काम करता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय का स्थायी सचिवालय है। संगठन के वर्तमान विधान के अनुसार संयुक्त राष्ट्र संघ का कोई भी सदस्य इस संगठन का सदस्य बन सकता है, उसे केवल सदस्यता के साधारण नियमों का पालन स्वीकार करना होगा। यदि सार्वजनिक सम्मेलन चाहे तो संयुक्त राष्ट्र संघ की परिधि से बाहर के देश भी इसके सदस्य बन सकते हैं। आज अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ के सदस्य राष्ट्रों की संख्या 71 है, जिनकी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्थाएँ विभिन्न प्रकार की हैं।

शक्ति तथा बैठक

अंतरराष्ट्रीय श्रम संघ की समूची शक्ति अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के हाथों में है। उसकी बैठक प्रति वर्ष होती है। इस सम्मेलन में प्रत्येक सदस्य राष्ट्र चार प्रतिनिधि भेजता है। परंतु इन प्रतिनिधियों में दो राजकीय प्रतिनिधि सदस्य राष्ट्रों की सरकारों द्वारा नियुक्त होते हैं, तीसरा उद्योगपतियों का और चौथा श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करता है। इनकी नियुक्ति भी सदस्य सरकारें ही करती हैं। सिद्धांत: ये प्रतिनिधि उद्योगपतियों और श्रमिकों की प्रधान प्रतिनिधि संस्थाओं से चुन लिए जाते हैं। उन संस्थाओं के प्रतिनिधित्व का निर्णय भी उनके देश की सरकारें ही करती हैं। परंतु प्रत्येक प्रतिनिधि को व्यक्तिगत मतदान का अधिकार होता है।

सम्मेलन का काम अंतरराष्ट्रीय श्रम नियम एवं सुझाव संबंधी मसविदा बनाना है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सामाजिक और श्रम संबंधी निम्नतम मान आ जाएँ। इस प्रकार यह एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच का काम करता है, जिस पर आधुनिक औद्योगिक समाज के तीनों प्रमुख अंगों-राज्य, संगठन (व्यवस्था, मैनेजमेंट) और श्रम-के प्रतिनिधि औद्योगिक संबंधों की महत्वपूर्ण समस्याओं पर परस्पर विचार विनिमय करते हैं। दो-तिहाई बहुमत द्वारा नियम और बहुमत द्वारा सिफारिश स्वीकृत होती है; परंतु स्वीकृत नियमों या सिफारिशों को मान लेना सदस्य राष्ट्रों के लिए आवश्यक नहीं। हाँ, उनसे ऐसी आशा अवश्य की जाती है कि वे अपने देशों की राष्ट्रीय संसदों के समक्ष 18 महीने के भीतर उन विषयों को विचार के लिए प्रस्तुत कर दें।

शासी निकाय

शासी निकाय भी एक तीन अंगों वाली संस्था है। यह 32 सदस्यों से निर्मित है, जिनमें 16 सरकारी तथा आठ-आठ उद्योगपतियों और श्रमिकों के प्रतिनिधि होते हैं। इन 16 सरकारी संस्थानों में से आठ उन देशों के लिए हैं, जो प्रधान औद्योगिक देश मान लिए गए हैं। शेष आठ प्रति तीसरे वर्ष सरकारी प्रतिनिधियों द्वारा निर्वाचित होते हैं, जिनके निर्वाचन का अधिकार कार्यकारिणी में सम्मिलित उन आठ देशों को भी प्राप्त होता है, जो प्रधान औद्योगिक देश होने के कारण उसके पहले से ही सदस्य हैं। इसका निर्णय भी कार्यकारिणी परिषद् द्वारा ही होता है कि आठ प्रधान औद्योगिक देश कौन से हों। कार्यकारिणी नीति और कार्यक्रम निर्धारित करती है, अंतर्राष्ट्रीय श्रम कार्यालय का संचालन और सम्मेलन द्वारा नियुक्त अनेक समितियों और आयोगों के कार्यों का निरीक्षण करती है।

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भारत में बाल श्रम के खिलाफ राष्ट्रीय कानून और नीतियां

कानून

भारत का संविधान (26 जनवरी 1950) मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत की विभिन्न धाराओं के माध्यम से कहता है-

  • 14 साल के कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जायेगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जायेगा (धारा 24)।
  • राज्य अपनी नीतियां इस तरह निर्धारित करेंगे कि श्रमिकों, पुरुषों और महिलाओं का स्वास्थ्य तथा उनकी क्षमता सुरक्षित रह सके और बच्चों की कम उम्र का शोषण न हो तथा वे अपनी उम्र व शक्ति के प्रतिकूल काम में आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रवेश करें (धारा 39-ई)।
  • बच्चों को स्वस्थ तरीके से स्वतंत्र व सम्मानजनक स्थिति में विकास के अवसर तथा सुविधाएं दी जायेंगी और बचपन व जवानी को नैतिक व भौतिक दुरुपयोग से बचाया जायेगा (धारा 39-एफ)।
  • संविधान लागू होने के 10 साल के भीतर राज्य 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेंगे (धारा 45)।

बाल श्रम एक ऐसा विषय है, जिस पर संघीय व राज्य सरकारें, दोनों कानून बना सकती हैं। दोनों स्तरों पर कई कानून बनाये भी गये हैं।

प्रमुख राष्ट्रीय कानूनी विकास में निम्नलिखित शामिल हैं

  • बाल श्रम (निषेध व नियमन) कानून 1986- यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को 13 पेशा और 57 प्रक्रियाओं में, जिन्हें बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए अहितकर माना गया है, नियोजन को निषिद्ध बनाता है। इन पेशाओं और प्रक्रियाओं का उल्लेख कानून की अनुसूची में है।
  • फैक्टरी कानून 1948 – यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन को निषिद्ध करता है। 15 से 18 वर्ष तक के किशोर किसी फैक्टरी में तभी नियुक्त किये जा सकते हैं, जब उनके पास किसी अधिकृत चिकित्सक का फिटनेस प्रमाण पत्र हो। इस कानून में 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए हर दिन साढ़े चार घंटे की कार्यावधि तय की गयी है और रात में उनके काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है।
  • भारत में बाल श्रम के खिलाफ कार्रवाई में महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप 1996 में उच्चतम न्यायालय के उस फैसले से आया, जिसमें संघीय और राज्य सरकारों को खतरनाक प्रक्रियाओं और पेशों में काम करनेवाले बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने और उन्हें गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने यह आदेश भी दिया था कि एक बाल श्रम पुनर्वास सह कल्याण कोष की स्थापना की जाये, जिसमें बाल श्रम कानून का उल्लंघन करनेवाले नियोक्ताओं के अंशदान का उपयोग हो।

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