IAS मुख्य परीक्षा GS पेपर-4 के 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | आत्महत्या और अपराध एवं सन्निहित नैतिक मुद्दे

IAS मुख्य परीक्षा GS पेपर-4 के 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | आत्महत्या और अपराध एवं सन्निहित नैतिक मुद्दे- संघ लोक सेवा आयोग अक्टूबर के महीने में सिविल सेवा मुख्य परीक्षा का आयोजन करेगा। इस परीक्षा का उद्देश्य एक छात्र को परखने से है जो शासन, संविधान, राजनीति, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की समझ के आधार से संबंधित है। समस्या यह है कि चाहे कितनी ही अच्छी तैयारी कर ली जाए और भले ही कितना ज्ञान अर्जित कर लिया जाए फिर भी परीक्षा को लेकर हमेशा अनिश्चितता का भय रहता ही है। इस डर पर काबू पाने के लिए  IAS मुख्य परीक्षा के GS पेपर-4 के लिए 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स आपसे साझा कर रहे हैं, जिससे आप इन टॉपिक्स पर अपनी पकड़ मजबूत कर पाएं और आप परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।

इस प्रश्न-पत्र में ऐसे प्रश्न शामिल होंगे जो सार्वजनिक जीवन में उम्मीदवारों की सत्यनिष्ठा, ईमानदारी से संबंधित विषयों के प्रति उनकी अभिवृत्ति तथा उनके दृष्टिकोण तथा समाज से आचार-व्यवहार में विभिन्न मुद्दों तथा सामने आने वाली समस्याओं के समाधान को लेकर उनकी मनोवृत्ति का परीक्षण करेंगे। इन आयामों का निर्धारण करने के लिये प्रश्न-पत्र में किसी मामले के अध्ययन (केस स्टडी) का माध्यम भी चुना जा सकता है।

 

IAS मुख्य परीक्षा GS पेपर-4 के 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स | टॉपिक 7  

परीक्षा के डर पर काबू पाने के लिए  IAS मुख्य परीक्षा के GS पेपर-4 के लिए 10 महत्वपूर्ण टॉपिक्स आपसे साझा कर रहे हैं, जिससे आप इन टॉपिक्स पर अपनी पकड़ मजबूत कर पाएं और आप परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकें। आज का टॉपिक ‘आत्महत्या और अपराध एवं सन्निहित नैतिक मुद्दे’ के विमर्श से संदर्भित है।

प्रश्न: आत्महत्या के प्रयास को क्या अपराध माना जाना चहिये, तर्कात्मक विश्लेषण करते हुए सन्निहित नैतिक मुद्दों का उल्लेख करें।
उत्तर: नहीं, सामान्य मनोदशा वाले इंसान की सोच में जीवन संघर्ष का दूसरा नाम होता है। लेकिन खुदकुशी का ख्याल मन में घोर अशांति, तनाव या अवसाद के चरमोत्कर्ष पर ही आता है। इसे चिकित्सा शास्त्र में असामान्य मनोदशा के दायरे में रखा गया है। ऐसे व्‍यक्ति को सज़ा देने की बजाये उसकी मदद की जरूरत है। करीब डेढ़ सदी पुरानी भारतीय दंड संहिता से आत्‍महत्‍या के प्रयास के अपराध से संबंधित धारा 309 को हटाने के लिये प्रयास लंबे समय से हो रहे हैं। इस बारे में विधि आयोग ने 1971 से 2008 के दौरान अपनी कई रिपोर्ट में सरकार से सिफारिश भी की। दुनिया के अधिकांश लोकतांत्रिक और विकसित देशों में आत्महत्या को अपराध नहीं माना जाता है।

आत्महत्या के प्रयास को अपराध न मानने के पीछे निम्नलिखित तर्क दिये जाते हैं-

  • अधिकांश मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट्स यह साबित करती हैं कि आत्महत्या का प्रयास करने वाला व्यक्ति मानसिक रूप से  डिसऑर्डर का शिकार होता है और वह बहुत अवसाद में होने के कारण यह कदम उठता है अतः व्यक्ति को दण्ड की नहीं बल्कि मनौवैज्ञानिक परामर्श की आवश्यकता होती है जिससे उसकी मनोदशा सामान्य हो सके और वह सामान्य जीवन-धारा में अग्रसर हो सके।
  • नैतिक और भावनात्मक रूप से इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखना चाहिए, क्योंकि अपराधी का आशय अपराध न कर अपनी जीवन-लीला समाप्त करना होता है और यह उसकी क्षणिक आवेग की स्थिति होती है।
  • सभी धर्मों में आत्महत्या को पाप बताते हुए इसे करने से रोका गया है और संघर्ष कर स्थिति से निजात पाने का तरीका ढूंढने का जिक्र किया गया है, अतः अपराधबोध से ग्रसित व्यक्ति को दंड भुगतना चाहिए और अवसाद से निजात पाने के लिए मनौवैज्ञानिक चिकित्सक से परामर्श लेनी चाहिए।
  • कुछ रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि जैसे ही किसी व्यक्ति का गुप्त रहष्य खुलता है जिसका वह खुलाशा नहीं चाहता था तो उसके अंतर्मन में अपराधबोध की भावना अधिक बलवती हो जाती है और वह त्वरित रूप से आत्महत्या करने हेतु प्रयासरत हो जाता है।
  • देश में बढ़ते मानसिक रोगियों की संख्या के लिए संयुक्त परिवार के विघटन, गरीबी, प्यार में विफलता, कर्ज अदायगी न कर पाना, प्रताड़ना, बेज्जती, किसी ख़ास स्थिति से उबर न पाना आदि मामलों को जिम्मेदार माना जा सकता है इसके अतिरिक्त शिक्षा और जानकारी का अभाव भी है।
  • खुदकुशी सही मायने में समाज और सरकार के स्तर पर व्यवस्था की विफलता का परिचायक है। कोई भी इंसान यह कदम तभी उठाता है जब वह परिवार या समाज के दंश का शिकार होता है। ऐसे में समाज को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ऐसे संवेदनशील लोगों के संरक्षण का जिम्मा खुद उठाना चाहिए बजाय उसे मरने के लिए छोड देने के.
  • यह चिंता की बात है कि देश में प्रति चार लाख की आबादी पर केवल एक मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य बजट का महज एक प्रतिशत मानसिक रोगियों के स्वास्थ्य की ओर खर्च किया जाता है। गाँव या दूर-दराज के इलाकों में तो इसका विकल्प भी मौजूद नहीं होता।

देश में बढ़ते मानसिक रोगियों की संख्या के लिए संयुक्त परिवार के विघटन और गरीबी को भी एक कारण बताते हुए गरीबों के सामने इस संबंध में विशेष दिक्कतें पेश आती हैं जिनके पास शिक्षा और जानकारी का अभाव है। उपरोक्त बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने मेंटल हेल्थकेयर एक्ट-2017 के तहत आत्महत्या के प्रयास को अपराध की सूची से अलग कर दिया गया है। पीड़ित को मानसिक चिकित्सा, रिहैबिलिटेशन सेंटर इत्यादि भेजने की व्यवस्था की गई है। इसकी सिफारिश द्वितीयक प्रशासनिक आयोग एवं विधि आयोग ने भी की थी। आत्महत्या को अपराध घोषित करने में मानवीय, मनोवैज्ञानिक रुग्णता एवं अपने परिवार के भविष्य इत्यादि जैसे नैतिक मुद्दे भी शामिल हैं।

 

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