जलवायु परिवर्तन से संबंधित प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन : मुख्य तथ्य !

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जलवायु परिवर्तन से संबंधित प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन- भारत में 12वीं पंचवर्षीय की शुरूआत अनवरत वृद्धि को केन्द्र में रखकर की गयी। इसके साथ-साथ अनवरत विकास की नीतियों एवं कार्यक्रमों जिनका हम अनुसरण कर रहे हैं द्वारा हमारे देश के नागरिकों एवं समूचे विश्व में यह संदेश जाता है कि भारत अनवरत विकास एवं इसके तीन आयामों-सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय के प्रति भी उतना ही प्रतिबद्ध है। एक वैश्विक तुलनात्मक मत सर्वेक्षण यह दर्शाता है कि भारत तथा वास्तव में सभी देश अनवरत विकास एवं जलवायु परिवर्तन के प्रति सजग एवं चिंतित हुए हैं। फिर भी, आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए संसाधन की अपेक्षित मात्रा प्राप्त करने के संदर्भ में चुनौतियां भी विकट हैं।UPSC CSE मुख्य परीक्षा 2018

जनता के बीच वाद-विवाद में जलवायु विज्ञान को महत्वपूर्ण स्थान देना सही है। जहां जलवायु विज्ञान अनिश्चितताओं का सामना कर रहा है वहां विश्व और अधिक संख्या में परमसंकट से जूझ रहा है। अब कुछ करने की भावना को इस तरह से महसूस किया जा रहा है जैसा आज तक नहीं किया गया। इसके विपरीत, यद्यपि विभिन्न जलवायु परिवर्तन पर हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में यह सुनिश्चित किया गया कि उत्सर्जन घटाने हेतु बहुपाक्षिक एवं नियम आधरित कवायद जारी रखी जाएगी तथापि विकसित देशों की पार्टियों द्वारा ली गई उत्सर्जन शपथ में निष्ठा का अभाव था। परमसंकट की बढ़ती घटनाओं तथा नागरिकों की बढ़ती मांग को देखते हुए विश्व के पास विकसित हो रहे विज्ञान की आवाज को सुनने तथा बोझ को समान एवं उचित रूप से बांटे जाने के बहुपक्षीयवाद के सिद्धांत की रणनीति एवं नीति से उचित तरीके से उसका उत्तर देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

पृथ्वी सम्मेलन: (1992)

  • स्टॉकहोम सम्मेलन (UNEP) की 20वीं वर्षगाँठ मनाने हेतु ब्राजील के शहर “रियो-डी-जेनेरियो” में आयोजित।
  • रियो सम्मेलन के नाम से भी प्रचलित।
  • विश्व भर में विकास के मुद्दों के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के मुद्दों पर चर्चा करना एवं समाधान निकालना।
  • जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता, सतत् विकास एवं पर्यावरण संरक्षण आदि मुद्दों पर चर्चा।
  • UNFCCC का गठनः वैश्विक तापमान में वृद्धि को रोकने के लिये। जैव विविधता पर कन्वेंशन CBD।
  • मरुस्थलीयकरण को रोकने हेतु कन्वेंशन।
  • एजेंडा-21 तय किया गया।

क्योटो प्रोटोकॉल: 1997 (COP-3)

  • UNFCCC की तीसरी बैठक जापान के क्योटो शहर में।
  • अंतर्राष्ट्रीय रूप से बाध्यकारी समझौता जो 2005 में लागू हुआ।
  • वायुमंडल में हरित गृह गैसों के उच्च स्तर हेतु सभी देश उत्तरदायी लेकिन औद्योगिक देश मुख्य रूप से ज़िम्मेदार। R (Common but differentiated responsibility) के माध्यम से विकसित देशों पर अधिक जिम्मेदारी डाली गई।
  • प्रथम प्रतिबद्धता अवधि- 2008-2012
  • दृतीय प्रतिबद्धता अवधि- 2013-2020
  • सदस्य देशेां की तीन श्रेणियां-
  • एनेक्स-I: ऐसे देश जिन्हें निश्चित मात्रा में निश्चित समय में GHG उत्सर्जन कम करना है।
  • एनेक्स-II: ऐसे देश जो विकासशील देशों को GHG कम करने के लिये वित्तीय सहयोग देंगे।
  • नॉन एनेक्सः ऐसे देश जिनकी कोई प्रतिबद्धता नहीं है मुख्य विकासशील व अल्प विकसित देश।
  • GHG उत्सर्जन में कमी लाने के लिये CDM व कार्बनट्रेडिंग जैसी युक्तियाँ।

बाली सम्मेलनः 2007 (COP-13)

  • UNFCCC का 13वाँ अधिवेशन व क्योटो प्रोटोकॉल के लिये CMP का तीसरा सम्मेलन
  • बाली रोडमैप व बाली एक्शन प्लान को अपनाया गया।
  • साझा दृष्टिकोण, न्यूनीकरण, अनुकूलन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, वित्तीयन के माध्यम से जलवायु परिवर्तन से लड़ना व संबंधित कन्वेंशन को प्रभावी एवं सतत् बनाना।

कोपेनहेगन सम्मेलनः 2009 (COP-15)

  • डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में UNFCCC का 15वाँ सम्मेलन।
  • जलवायु परिवर्तन सहयोग हेतु आवश्यक आधारभूत संरचना निर्माण पर चर्चा, क्योटो प्रोटोकॉल के CDM को बढ़ावा।
  • USA व BASIC देशों के बीच ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन पर रोक लगाने हेतु समझौता।
  • कोपेनहेगन एकार्ड के तहत महत्तम वैश्विक तापमान में वृद्धि पूर्व औद्योगिक स्तर से 2ºC से ज्यादा न हो। यह एकार्ड गैर-बाध्यकारी था।
  • विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को फंड देने की प्रतिबद्धता।
  • REDD+ की स्थापना।
  • ग्रीन क्लाइमेट फंड स्थापित करने पर चर्चा।

कानकुन सम्मेलनः 2010 (COP-16)

  • मैक्सिको के शहर कानकुन में COP-16 की बैठक।
  • तकनीकी तंत्र की स्थापना- इसके तहत प्रौद्योगिकी विकास एवं तकनीकी हस्तांतरण संबंधित कार्यों के क्रियान्वयन को बढ़ावा देना था ताकि जलवायु परिवर्तन के लिये शमन व अनुकूलन से सम्बंधित कार्यवाही को सहयोग मिल सके।
  • कानकुन अनुकूलन फ्रेमवर्क- इसके तहत अनुकूलन हेतु कार्यों में बढ़ावा देना।
  • ग्रीन क्लाइमेंट फंड- विकासशील देशों में प्रोजेक्ट, कार्यक्रम, नीतियों इत्यादि के वित्तीय समर्थन हेतु।UPSC CSE मुख्य परीक्षा 2018 : निबंध लेखन

डरबन सम्मेलनः 2011 (COP-17)

  • क्योटो प्रो प्रोटोकॉल, बाली एक्शन प्लान, कानकुन समझौते पर चर्चा हुई।
  • जलवायु परिवर्तन पर सार्वभौमिक कानूनी समझौते को अपनाने की बात की गई।
  • कृषि को जलवायु परिवर्तन के अंदर लाया गया।
  • 2013 के प्रारंभ में होने वाली क्योटो प्रोटोकॉल की द्वितीय प्रतिबद्धता अवधि की स्थापना पर सहमति।
  • भारत CBDR की मांग पर दृढ़ रहा।
  • ग्लोबल क्लाइमेट फंड की वास्तविक स्थापना इसी सम्मेलन में हुई।

दोहा सम्मेलनः 2012 (COP-18)

  • धनी देशों ने वैश्विक तापन की समस्या से पृथ्वी को बचाने हेतु ज्यादा जिम्मेदारी निभाने की मांग को ठुकरा दिया।
  • वित्तीय पोषण तथा जलवायु परिवर्तन पर होने वाले नुकसान की आपूर्ति के मुद्दे पर सकारात्मक रूप से विचार की मांग।
  • दीर्घकालिक सहयोगात्मक कार्यमंच पर धनी व गरीब देशों के बीच सहमति नहीं बन पाई।
  • सरकार 2015 तक एक सार्वभौमिक जलवायु परिवर्तन समझौते को तैयार करने हेतु राजी हो गई, जिसमें सभी देश सम्मिलित होंगे। यह 2020 से प्रभावी होना था।
  • क्योटो प्रोटोकॉल में संशोधन तथा 2013 से द्वितीय प्रतिबद्धता अवधि लागू।

वारसा सम्मलेन:2013 (COP-19)

  • पोलैंड की राजधानी वारसा में संपन्न।
  • 2020 तक 100 अरब अमेरिकी डॉलर विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन से मुकाबले हेतु देने पर सहमति।
  • हरित जलवायु निधि को व्यवसाय हेतु खोल दिया गया।
  • जलवायु परिवर्तन पर कार्य हेतु तकनीकी को बढ़ावा।
  • उत्तरदायित्व में प्रगति।

लीमा सम्मेलनः 2014 (COP-20)

  • पेरू के लीमा शहर में संपन्न।
  • लीमा कॉल फॉर क्लाइमेट एक्शन के साथ विश्व ने एक नए सार्वभौमिक जलवायु समझौते की ओर कदम बढ़ाया। सरकार पेरिस समझौते हेतु जमीनी नियमों के लिये एवं नए समझौते के अनुकूलन संबंधी दायित्वों हेतु राजी हो गई।
  • विकसित एवं विकासशील देशों द्वारा नए ग्लोबल क्लाइमेट फंड (GCF) का पूंजीकरण।
  • पारदर्शिता व विश्वास निर्माण के लिये बहुपक्षीय मूल्यांकन।
  • शिक्षा एवं जागरूकता पर लीमा मंत्रिस्तरीय उद्घोषणा में सरकार का स्कूली पाठ्यक्रम में जलवायु परिवर्तन को जोड़ना।
  • नेशनल एडॉप्शन प्लान के महत्त्व को पहचाना गया।

पेरिस सम्मेलनः 2015 (COP-21)

  • विश्व सभी राष्ट्रों के लिये वर्ष 2020 के बाद की अवधि हेतु जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध कार्य करने के लिये योजना प्रस्तुत करता है।
  • CBDR-RC समान परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियों तथा संबंधित क्षमताओं पर आधारित।
  • डाउन टू टॉप एप्रोच के तहत जलवायु परिवर्तन योजना तैयार करना।
  • INDC सभी राष्ट्रों द्वारा प्रस्तुत करने का प्रावधान।
  • शमन, अनुकूलन प्रक्रियाओं को सुनिश्चित किया गया जिसके लिये 2020 तक प्रतिवर्ष कम-से-कम 100 बिलियन डॉलर राशि जुटाने के लिये संस्थागत ढाँचे का निर्माण किया गया।
  • राज्यों के बीच स्वैच्छिक सहयोग का समावेश किया गया।

मराकेश सम्मलेन: 2016 (COP-22)

  • मोरक्को की राजाानी मराकेश में संपन्न।
  • “पेरिस समझौते हेतु पार्टीज” का प्रथम सम्मेलन।
  • हमारी जलवायु व सतत् विकास के लिये मराकेश कार्यवाही उद्घोषणा को स्वीकार किया गया।
  • पोस्ट-पेरिस क्रियाविधियों को बढ़ाने पर जोर।
  • सतत् विकास लक्ष्य-2030 को समर्थन।
  • विकसित देशों द्वारा 2030 तक प्रतिवर्ष 100 बिलियन डॉलर विकासशील देशों को जलवायु क्रियाओं के लिये देने की पुनः पुष्टि।
  • आपसी सहयागे को बढा़वा देकर गरीबी उन्मूलन, खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना व कृषि में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने पर जोर।

बॉन सम्मलेन: 2017 (COP-23)

  • जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए वैश्विक समझौते को लागू करने के उद्देश्य से 6-17 नवंबर, 2017 के मध्य जर्मनी के शहर बॉन में संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के दलों के 23वें सम्मलेन का आयोजन हुआ।
  • सम्मलेन की मेजबानी संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज के सचिव ने किया और अध्यक्षता फिजी के प्रधानमंत्री फ्रैंक बैनिमारामा द्वारा की गई।
  • इस सम्मेलन का उद्देश्य जलवायु प्रणाली के साथ खतरनाक मानवजनित व्यवधानों को रोकना था अतः सम्मलेन में यह सवाल उठाया गया था कि उपलब्ध कार्बन स्पेस के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर चुके विकसित देश क्या गरीब और विकासशील देशों को सहायता देंगे? और क्या अमीर देशों द्वारा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिये अब तक क्या कार्रवाई की गई है और क्या कोयले का उपयोग सीमित नहीं किया जाना चाहिये?
  • इस सम्मलेन में चरणबद्ध तरीके से कोयले के उपयोग को सीमित करने (coal phase-out) पर सहमति बनी साथ ही हरित इमारतों (green-buildings) को स्थापित करने और इको- गतिशीलता (eco-mobility) में तेज़ी लाने का निर्णय लिया गया।
  • मुद्दों के समाधान की दिशा में कार्य करने के दौरान लिंग संबंधी कारकों की पहचान करने का निर्णय हुआ।
  • जलवायु वार्ताओं में स्थानीय लोगों की राय को अहमियत देने का निर्णय लिया गया।
  • कृषि कार्यों के माध्यम से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के मुद्दे पर विचार-विमर्श का निर्णय।
  • सम्मलेन में एक महत्त्वपूर्ण प्रगति ‘टलानोआ वार्ता’ (Talanoa Dialogue- फिजियाई नाम- जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में विभिन्न देशों द्वारा किये जा रहे प्रयासों एवं इस संबंध में प्रगति का आकलन करने के लिये एक वर्षीय प्रक्रिया) के रूप में हुई।

उल्लेखनीय है कि कोप (COP) 24 का आयोजन वर्ष 2018 में पोलैंड में किया जाएगा।GS पेपर 4 के तहत एथिक्स आधारित केस स्टडी प्रश्नों का समाधान कैसे करें !

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन एवं उससे उत्पन्न संकट विश्व के समक्ष प्रमुख चुनौती है। इससे निपटने के लिए सामूहिक प्रयास की रूपरेखा तैयार करने एवं कार्ययोजनाओं के कार्यान्वयन को प्रोत्साहित तथा समीक्षा करने के लिए प्रतिवर्ष जलवायु परिवर्तन सम्मेलन आयोजित किया जाता है। इन सम्मेलनों में लिए गए निर्णयों एवं प्रारंभ कार्यक्रम तथा नीतियों से जलवायु परिवर्तन के संकट को कम करने में मदद मिलेगी।
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