राज्य सभा : परिचय , मतदान प्रक्रिया और शक्तियां !

0
7122
राज्य सभा : परिचय , मतदान प्रक्रिया और शक्तियां !

राज्य सभा : इतिहास, मतदान प्रक्रिया और शक्तियां – राज्यसभा चुनाव में बीजेपी को जबदस्त सफलता हासिल हुई है। पार्टी के 38 सालों के इतिहास में ये पहला मौका है जब उसके खाते में राज्यसभा की 69 सीटें हैं। लेकिन अभी उसकी अगुवाई में चल रहा गठबंधन एनडीए बहुमत से दूर रहेगा। 245 सदस्यों वाली राज्यसभा में बीजेपी अब भी 126 के बहुमत के आंकड़े से दूर है। वहीं कांग्रेस के 4 सदस्य घट गए हैं। अब उसके पास राज्यसभा में 50 सीटें हो गई हैं।

अभी हुए राज्यसभा चुनाव के चलते यह जानना की राज्य सभा क्यों महत्त्वपूर्ण है और इसके कार्य क्या हैं और इसकी चुनावी प्रक्रिया क्या है। तो आइए नीचे हम इसी का उल्लेख्य करते हैं।

 

राज्य सभा : इतिहास , मतदान प्रक्रिया और शक्तियां !

काउंसिल ऑफ स्टेट्स, जिसे राज्य सभा भी कहा जाता है, की घोषणा सभापीठ द्वारा सभा में 23 अगस्त, 1954 को की गई थी। भारत में द्वितीय सदन का प्रारम्भ 1918 के मोन्टेग-चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन से हुआ। भारत सरकार अधिनियम, 1919  के तहत 1921 में पहली बार दूसरा सदन काउंसिल ऑफ स्टेट्स अस्तित्व में आया, जिसका गवर्नर-जनरल पदेन अध्यक्ष होता था। संविधान सभा के  निर्णय के अनुसार स्वतंत्र भारत में राज्य सभा के गठन की घोषणा 23 अगस्त 1954 को की गई थी जब उपराष्ट्रपति को इसका पदेन सभापति बनाया गया। राज्य सभा का गठन संघीय व्यवस्था में राज्यों के हितों की रक्षा करने के लिए किया गया है। परन्तु इसके सदस्यों की संख्या लोकसभा से कम रखी गयी है। राज्यसभा में विशेषज्ञों की नियुक्ति की वजह से इसे पुनरीक्षण सदन भी माना जाता है जो लोकसभा द्वारा पारित प्रस्तावों की ढंग से जांच कर सके और इसके सदस्य मंत्रिपरिषद को भी बेहतर स्वरुप दे सकते हैं।

राज्य सभा क्यों?

स्वतंत्र भारत के लिए एक द्विसदनी विधानमंडल बनाने का निर्णय मुख्य रूप से इसलिए किया गया क्योंकि परिसंघीय प्रणाली को अपार विविधताओं वाले इतने विशाल देश के लिए सर्वाधिक सहज स्वरूप की सरकार माना गया। वस्तुत:, एक प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित एकल सभा को स्वतंत्र भारत के समक्ष आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए अपर्याप्त समझा गया। अत:, ‘काउंसिल ऑफ स्टेट्स’ के रूप में ज्ञात एक ऐसे द्वितीय सदन का सृजन किया गया। इसका आशय परिसंघीय सदन अर्थात् एक ऐसी सभा से था जिसका निर्वाचन राज्यों और दो संघ राज्य क्षेत्रों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया गया, जिनमें राज्यों को समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया।

राज्यसभा का स्वरूप

संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार राज्‍यसभा में 250 सदस्‍य होते हैं जिनमे 12 सदस्‍य राष्‍ट्रपति द्वारा नामित और बाकी 238 लोग चौथी अनुसूची में जनसंख्या के आधार पर राज्यों से चुने जाते हैं। अमेरिका की सीनेट में सभी राज्यों को बराबर प्रतिनिधित्व मिलता है और 1913 के 17वें संशोधन द्वारा वहां प्रत्यक्ष निर्वाचन की पद्धति लागू हो गयी है। अनुच्छेद 84 के तहत भारत का नागरिक होने के अलावा राज्‍यसभा की सदस्यता हेतु न्यूनतम आयु 30 वर्ष तय की गई जबकि निचले सदन लोक सभा के लिए यह 25 वर्ष है। संविधान के अनुच्छेद 102 में दिवालिया और कुछ अन्य वर्ग के लोगों को राज्यसभा सदस्य बनने के लिए अयोग्य घोषित किया गया है। जन प्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 154 के अनुसार राज्‍यसभा सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। हर 2 साल में इसके एक तिहाई सदस्‍य सेवानिवृत्त हो जाते हैं इसलिए राज्‍यसभा कभी भंग नहीं होती।
किसी सदस्य के कार्यकाल की समाप्ति पर सेवानिवृत्ति को छोड़कर अन्यथा उत्पन्न हुई रिक्ति को भरने के लिए कराया गया निर्वाचन ‘उप-चुनाव’ कहलाता है। उप-चुनाव में निर्वाचित कोई सदस्य उस सदस्य की शेष कार्यावधि तक सदस्य बना रह सकता है जिसने त्यागपत्र दे दिया था या जिसकी मृत्यु हो गई थी या जो दसवीं अनुसूची के अधीन सभा का सदस्य होने के लिए निरर्हित हो गया था।

 राज्यसभा निर्वाचन की चुनावी प्रक्रिया

राज्य सभा में सदस्यों का चुनाव राज्य विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा द्वारा किया जाता है जिसमे विधान परिषद् के सदस्य वोट नहीं डाल सकते। नामांकन फाइल करने के लिए न्यूनतम 10  सदस्यों की सहमति आवश्यक होती है। सदस्‍यों का चुनाव एकल हस्‍तांतरणीय मत के द्वारा निर्धारित कानून से होता है। इसके अनुसार राज्य की कुल विधानसभा सीटों को राज्यसभा की सदस्य संख्या में एक जोड़ कर उसे विभाजित किया जाता है फिर उसमें 1 जोड़ दिया जाता है। इसे इस तरह समझें कि उ. प्र. में कुल 403 विधायक हैं और 11 राज्यसभा सीट हैं जिन्हें 12 ( 11 + 1) से विभाजित करके फिर उसमे 1 जोड़ने पर 34 की संख्या आती है जो वहां चुनाव जीतने के लिए न्यूनतम वोटों की संख्या होगी। विधायक वरीयता के अनुसार अपना वोट देते हैं और पहली वरीयता के न्यूनतम वोट जिसे मिल जाते हैं वह व्यक्ति विजयी हो जाता है। इसके पश्चात यदि सदस्यों के लिए वोटिंग होती है तो सबसे कम वोट मिलने वाले उम्मीदवार के वोटों को दूसरी वरीयता के अनुसार अन्य उम्मीदवारों को ट्रान्सफर कर दिया जाता है। यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक उम्मीदवार विजयी नहीं हो जाए। इसीलिए चुनाव होने की स्थिति में विधायकों द्वारा अन्य वरीयता के मतों का महत्व बहुत बढ़ जाता है।

दोनों सभाओं के बीच संबंध

  • संविधान के अनुच्छेद 75 (3) के अधीन, मंत्री परिषद् सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति जिम्मेदार होती है जिसका आशय यह है कि राज्य सभा सरकार को बना या गिरा नहीं सकती है। तथापि, यह सरकार पर नियंत्रण रख सकती है और यह कार्य विशेष रूप से उस समय बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब सरकार को राज्य सभा में बहुमत प्राप्त नहीं होता है।
  • किसी सामान्य विधान की दशा में, दोनों सभाओं के बीच गतिरोध दूर करने के लिए, संविधान में दोनों सभाओं की संयुक्त बैठक बुलाने का उपबंध है।
  • वस्तुत:, अतीत में ऐसे तीन अवसर आए हैं जब संसद की सभाओं की उनके बीच मतभेदों को सुलझाने के लिए संयुक्त बैठक हुई थी। संयुक्त बैठक में उठाये जाने वाले मुद्दों का निर्णय दोनों सभाओं में उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों की कुल संख्या के बहुमत से किया जाता है।
  • संयुक्त बैठक संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष में आयोजित की जाती है जिसकी अध्यक्षता लोकसभाध्यक्ष द्वारा की जाती है। तथापि, धन विधेयक की दशा में, संविधान में दोनों सभाओं की संयुक्त बैठक बुलाने का कोई उपबंध नहीं है, क्योंकि लोक सभा को वित्तीय मामलों में राज्य सभा की तुलना में प्रमुखता हासिल है।
  • संविधान संशोधन विधेयक के संबंध में, संविधान में यह उपबंध किया गया है कि ऐसे विधेयक को दोनों सभाओं द्वारा, संविधान के अनुच्छेद 368 के अधीन विहित रूप में, विशिष्ट बहुमत से पारित किया जाना होता है। अत:, संविधान संशोधन विधेयक के संबंध में दोनों सभाओं के बीच गतिरोध को दूर करने का कोई उपबंध नहीं है।
  • मंत्री संसद की किसी भी सभा से हो सकते हैं। इस संबंध में संविधान सभाओं के बीच कोई भेद नहीं करता है। प्रत्येक मंत्री को किसी भी सभा में बोलने और उसकी कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार होता है, लेकिन वह उसी सभा में मत देने का हकदार होता है जिसका वह सदस्य होता है।
  • इसी प्रकार, संसद की सभाओं, उनके सदस्यों और उनकी समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों के संबंध में, दोनों सभाओं को संविधान द्वारा बिल्कुल समान धरातल पर रखा गया है।
  • जिन अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों के संबंध में दोनों सभाओं को समान शक्तियां प्राप्त हैं वे इस प्रकार हैं:- राष्ट्रपति का निर्वाचन तथा महाभियोग, उपराष्ट्रपति का निर्वाचन, आपातकाल की उद्घोषणा का अनुमोदन, राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता से संबंधित उद्घोषणा और वित्तीय आपातकाल। विभिन्न संवैधानिक प्राधिकरणों आदि से प्रतिवेदन तथा पत्र प्राप्त करने के संबंध में, दोनों सभाओं को समान शक्तियां प्राप्त हैं।
    इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि मंत्री-परिषद् की सामूहिक जिम्मेदारी के मामले और कुछ ऐसे वित्तीय मामले, जो सिर्फ लोक सभा के क्षेत्राधिकार में आते हैं, के सिवाए दोनों सभाओं को समान शक्तियां प्राप्त हैं।

राज्य सभा की विशेष शक्तियां

  • एक परिसंघीय सदन होने के नाते राज्य सभा को संविधान के अधीन कुछ विशेष शक्तियां प्राप्त हैं। विधान से संबंधित सभी विषयों/क्षेत्रों को तीन सूचियों में विभाजित किया गया है-संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। संघ और राज्य सूचियां परस्पर अपवर्जित हैं-कोई भी दूसरे के क्षेत्र में रखे गए विषय पर कानून नहीं बना सकता।
  • तथापि, यदि राज्य सभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत द्वारा यह कहते हुए एक संकल्प पारित करती है कि यह “राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन” है कि संसद, राज्य सूची में प्रमाणित किसी विषय पर विधि बनाए, तो संसद भारत के संपूर्ण राज्य-क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए उस संकल्प में विनिर्दिष्ट विषय पर विधि बनाने हेतु अधिकार-संपन्न हो जाती है। ऐसा संकल्प अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहेगा परन्तु यह अवधि इसी प्रकार के संकल्प को पारित करके एक वर्ष के लिए पुन: बढ़ायी जा सकती है।
  • यदि राज्य सभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत द्वारा यह घोषित करते हुए एक संकल्प पारित करती है कि संघ और राज्यों के लिए सम्मिलित एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन किया जाना राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन है, तो संसद विधि द्वारा ऐसी सेवाओं का सृजन करने के लिए अधिकार-संपन्न हो जाती है।
  • संविधान के अधीन, राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपात की स्थिति में, किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की स्थिति में अथवा वित्तीय आपात की स्थिति में उद्घोषणा जारी करने का अधिकार है। ऐसी प्रत्येक उद्घोषणा को संसद की दोनों सभाओं द्वारा नियत अवधि के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है।
  • तथापि, कतिपय परिस्थितियों में राज्य सभा के पास इस संबंध में विशेष शक्तियाँ हैं। यदि कोई उद्घोषणा उस समय की जाती है जब लोक सभा का विघटन हो गया है अथवा लोक सभा का विघटन इसके अनुमोदन के लिए अनुज्ञात अवधि के भीतर हो जाता है और यदि इसे अनुमोदित करने वाला संकल्प राज्य सभा द्वारा अनुच्छेद 352, 356 और 360 के अधीन संविधान में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर पारित कर दिया जाता है, तब वह उद्घोषणा प्रभावी रहेगी।

वित्तीय मामलों में राज्य सभा

  • धन विधेयक केवल लोक सभा में पुर:स्थापित किया जा सकता है। इसके उस सभा द्वारा पारित किए जाने के उपरान्त इसे राज्य सभा को उसकी सहमति अथवा सिफारिश के लिए पारेषित किया जाता है। ऐसे विधेयक के संबंध में राज्य सभा की शक्ति सीमित है। राज्य सभा को ऐसे विधेयक की प्राप्ति से चौदह दिन के भीतर उसे लोक सभा को लौटाना पड़ता है।
  • यदि यह उस अवधि के भीतर लोक सभा को नहीं लौटाया जाता है तो धन विधेयक को उक्त अवधि की समाप्ति पर दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिसमें इसे लोक सभा द्वारा पारित किया गया था। राज्य सभा धन विधेयक में संशोधन भी नहीं कर सकती; यह केवल संशोधनों की सिफारिश कर सकती है और लोक सभा, राज्य सभा की सभी या किन्हीं सिफारिशों को स्वीकार अथवा अस्वीकार कर सकेगी।
  • धन विधेयक के अलावा, वित्त विधेयकों की कतिपय अन्य श्रेणियों को भी राज्य सभा में पुर:स्थापित नहीं किया जा सकता। तथापि, कुछ अन्य प्रकार के वित्त विधेयक हैं जिनके संबंध में राज्य सभा की शक्तियों पर कोई निर्बंधन नहीं है। ये विधेयक किसी भी सभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं और राज्य सभा को ऐसे वित्त विधेयकों को किसी अन्य विधेयक की तरह ही अस्वीकृत या संशोधित करने का अधिकार है। वस्तुत: ऐसे विधेयक संसद की किसी भी सभा द्वारा तब तक पारित नहीं किए जा सकते, जब तक राष्ट्रपति ने उस पर विचार करने के लिए उस सभा से सिफारिश नहीं की हो।
  • तथापि, इन सारी बातों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि राज्य सभा का वित्त संबंधी मामलों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। भारत सरकार के बजट को प्रतिवर्ष राज्य सभा के समक्ष भी रखा जाता है और इसके सदस्यगण उस पर चर्चा करते हैं। यद्यपि राज्य सभा विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों पर मतदान नहीं करती – यह मामला अनन्य रूप से लोक सभा के लिए सुरक्षित है।
  • फिर भी, भारत की संचित निधि से किसी धन की निकासी तब तक नहीं की जा सकती, जब तक दोनों सभाओं द्वारा विनियोग विधेयक को पारित नहीं कर दिया जाता। इसी प्रकार, वित्त विधेयक को भी राज्य सभा के समक्ष लाया जाता है। इसके अलावा, विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समितियां, जो मंत्रालयों/विभागों की वार्षिक अनुदान मांगों की जांच करती हैं, संयुक्त समितियां हैं जिनमें दस सदस्य राज्य सभा से होते हैं।

सभा के नेता

सभा का नेता एक ऐसा अधिकारी है जो सभा के कुशल और सुचारू संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राज्य सभा में सभा का नेता सामान्यतया प्रधान मंत्री होता है, यदि वह इसका सदस्य है, अथवा कोई ऐसा मंत्री होता है, जो इस सभा का सदस्य है और जिसे उनके द्वारा इस रूप में कार्य करने के लिए नाम-निर्दिष्ट किया गया हो। उसका प्राथमिक उत्तरदायित्व सभा में सौहार्दपूर्ण और सार्थक वाद-विवाद के लिए सभा के सभी वर्गों के बीच समन्वय बनाए रखना है। गठबंधन सरकारों के युग में उनका कार्य और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।

विपक्ष के नेता

विधायिका में विपक्ष के नेता के पद का अत्यधिक सार्वजनिक महत्व है। इसका महत्व संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष को दी गई मुख्य भूमिका से उद्भूत होता है। विपक्ष के नेता का कार्य वस्तुत: अत्यधिक कठिन है क्योंकि उन्हें आलोचना करनी पड़ती है, गलती इंगित करनी पड़ती है और ऐसे वैकल्पिक प्रस्तावों/नीतियों को प्रस्तुत करना पड़ता है जिन्हें लागू करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है।
हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य सभा ने रचनात्मक और प्रभावी भूमिका निभाई है। विधायी क्षेत्र और सरकारी नीतियों को प्रभावित करने के मामले में इसका कार्य-निष्पादन काफी अहम रहा है। वस्तुत: राज्य सभा ने संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक लोक सभा के साथ सहयोग की भावना से कार्य किया है। राज्य सभा ने जल्दबाजी में कानून पारित नहीं किया है और संघीय सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करते हुए एक आदर्श सभा की तरह कार्य किया है। संघीय सभा होने के नाते इसने देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने का कार्य किया है और संसदीय लोकतंत्र में लोगों की आस्था बढ़ाई है।

सफल तैयारी रणनीति के लिए निम्न मंत्र को याद रखें:

बुनियादी समझ विकसित करें > प्रतिदिन अभ्यास करें > हर तीसरे दिन इसे दोहराएं > सम्बंधित 1 माॅक टेस्ट/सप्ताह दें > विश्लेषण पर आत्ममंथन करें > अपने कमजोर पक्ष को सुधारें > क्रम फिर से दोहराएँ !

ध्यान रहे कि ये सभी लाभ तभी मिलते हैं अगर आपने मॉक टेस्ट श्रृंखला का चयन भली-भाँति सोच-समझकर किया है। ‘OnlineTyari’ के IAS प्रारंभिक परीक्षा : रेगुलर पैकेज (मॉक टेस्ट सीरीज़) कार्यक्रम श्रेष्ठ गुणवत्ता वाला है जिसमें आप मार्च से मई के दौरान अपनी सुविधानुसार काफी सारी जाँच परीक्षाएँ दे सकते हैं।

अगर आप नियमित रूप से इस कार्यक्रम के अनुरूप अपना शेड्यूल बनाकर अध्ययन करते हैं और इसमें दिये गए अभ्यास प्रश्नों को हल करते हैं, तो हम आपको इस बात का पूरा विश्वास दिलाते हैं कि प्रारंभिक परीक्षा आपके लिये बाधा नहीं बन सकती। आप बस नियमित रूप से इस कार्यक्रम को फॉलो कीजिये।

प्रयोग करें NAVRATRI35 कूपन कोड और पाएं 35% की अतिरिक्त छूट। 

IAS Prelims 2018 : Regular Pak

IAS प्रारंभिक परीक्षा 2018 : रेगुलर पैकेज   

यह पैकेज IAS प्रारंभिक परीक्षा 2018 को ध्यान में रखकर संकलित किया गया है। यह पैकेज अभ्यर्थियों को उचित मार्गदर्शन प्रदान करता है तथा उनको प्रारंभिक परीक्षा के लिए रणनीत बनाने में सहायता प्रदान करता है तथा साथ ही साथ उनके आत्मविश्वास में वृद्धि भी करता है। इस पैकेज में 8 परीक्षा अनुरूप मॉक टेस्ट, 6 सेक्शनल टेस्ट, 2 मॉक टेस्ट और 1 विगत वर्ष प्रश्नपत्र सम्मिलित है।

अभी अभ्यास शुरू करें !

IAS प्रारंभिक परीक्षा 2018 के बारे में और अधिक जानकारी के लिए हमसे जुड़े रहें। IAS परीक्षा में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए, सर्वश्रेष्ठ IAS परीक्षा तैयारी ऐप नि:शुल्क डाउनलोड करें।

Best Government Exam Preparation App OnlineTyari

NO COMMENTS

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.