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UPSC IAS परीक्षा 2019: राज्यवार भौगोलिक संकेतक

UPSC IAS परीक्षा 2019: राज्यवार भौगोलिक संकेतक- वस्‍तुओं के भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और सुरक्षा) अधिनियम,1999 में भौगोलिक संकेत का अर्थ है एक ऐसा संकेत, जो वस्‍तुओं की पहचान, जैसे कृषि उत्‍पाद, प्राकृतिक वस्‍तुएं या विनिर्मित वस्‍तुएं, एक देश के राज्‍य क्षेत्र में उत्‍पन्‍न होने के आधार पर करता है, जहां उक्‍त वस्‍तुओं की दी गई गुणवत्ता, प्रतिष्‍ठा या अन्‍य कोई विशेषताएं इसके भौगोलिक उद्भव में अनिवार्यत योगदान देती हैं।

उदाहरण: कांचीपुरम सिल्क साड़ी, अल्फांसो आम, नागपुर नारंगी, कोल्हापुरी चपल, बीकानेरी भुजिया, आगरा पाथा, दार्जीलिंग की चाय, महाबलेश्वर स्ट्रॉबेरी, जयपुर की ब्लू पॉटरी, बनारसी साड़ी, और तिरुपति के लड्डू।

हाल ही में, सरकार ने पारंपरिक बुनकरी को पुनर्जवित करने और उन्हें बढ़ावा देने के लिए वीयर हैंडलूम और कॉटनइजकूल जैसी पहल शुरू की है। GI को बढ़ावा देना सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के अनुरुप है। इससे बाहरी लोग शीर्षक/लेबल “दार्जिलिंग” के साथ अन्य प्रकार की चाय नहीं बेच सकते हैं, अन्यथा उन्हें दंडित किया जा सकता है।

UPSC IAS परीक्षा 2019: राज्यवार भौगोलिक संकेतक

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भौगोलिक संकेत (जीआई) विश्व व्यापार संगठन के समझौते व्यापार से संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकारों (ट्रिप्स) द्वारा नियंत्रित है। भारत स्तर पर, वस्‍तुओं के भौगोलिक संकेत (पंजीकरण और सुरक्षा) अधिनियम, 1999 भारत में भौगोलिक संकेतों को अधिशासित करता है। इस अधिनियम के अंतर्गत वाणिज्‍य एवं उद्योग मंत्रालय, औद्योगिक नीति एवं प्रवर्तन विभाग के अंतर्गत महानियंत्रक, पेटेंट, डिज़ाइन तथा ट्रेड मार्ग, ”भौगोलिक संकेतों के पंजीयक” हैं। किसी भौगोलिक संकेतक का पंजीकरण 10 साल की अवधि के लिए वैध होता है। यह प्रत्येक 10 वर्ष की अवधि के बाद आगे समय-समय पर नवीकृत किया जा सकता है। यदि किसी पंजीकृत भौगोलिक संकेतक का नवीकरण नहीं किया जाए तो उसे रजिस्टर से हटाया जा सकता है।

भौगोलिक संकेत के लाभ

इसके निम्नलिखित लाभ हैं-

भौगोलिक संकेत के प्रकार

भौगोलिक संकेत दो प्रकार के होते हैं –
(i) पहले प्रकार में वे भौगोलिक नाम हैं जो उत्‍पाद के उद्भव के स्‍थान का नाम बताते हैं जैसे शैम्‍पेन, दार्जीलिंग आदि।
(ii) दूसरे हैं गैर-भौगोलिक पारम्‍परिक नाम, जो यह बताते हैं कि एक उत्‍पाद किसी एक क्षेत्र विशेष से संबद्ध है जैसे अल्‍फांसो, बासमती आदि।

भौगोलिक संकेत की समस्याएं

भौगोलिक संकेत के पंजीकरण योग्य नहीं है

भौगोलिक संकेत को पूरी तरह से ऐतिहासिक और अनुभवजन्य जांच के बाद आवंटित किया जाना चाहिए। जिन उत्पादों की उत्पत्ति का पता लगाया नहीं जा सकता है, उन्हे भौगोलिक संकेत के साथ कोई भी क्षेत्र प्रदान नहीं किया जाना चाहिए या फिर दोनों राज्यों को स्वामित्व दिया जाना चाहिए। राज्यों और समुदाय के फोकस को केवल क्षेत्र में प्रमाणन से हटा कर, इसके बजाय सभी संसाधनों के उत्पाद को बढ़ावा देने की जरूरत है और जिससे इससे संबंधित उद्योगों को भी बढ़ावा मिल सके। जाहिर है कि भारत में विविध प्रकार के उत्पादों का उत्पादन करने की क्षमता तो है ही साथ साथ एक समृद्ध सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधता भी है। इसका उद्देश्य भौगोलिक संकेत के तहत कवर किए गए उत्पादों के उस दायरे को बढ़ाने के लिए करना चाहिए, जिससे इसमें से अधिकतम लाभ मिल सके।

भारतीय भौगोलिक संकेतकों के संभावित उदाहरण

• दार्जिलिंग चाय • कांचीपुरम सिल्क साड़ी • अल्फांसो (हापुस) आम • नागपुर के संतरे • कोल्हापुरी चप्पलें • बीकानेरी भुजिया • आगरे का पेठा आदि।

यहां हम अपने लेख को समाप्त करते हैं और आशा करते हैं की यह लेख आपके लिए लाभदायक सिद्ध होगा।

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Ajay K. Tripathi :
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