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बाढ़: भारत की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान को कम करना

बाढ़: भारत की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान को कम करना:

नेपाल, भारत और बांग्लादेश में मानसून के कारण आयी बाढ़ से कम से कम 300 लोग मारे गए हैं लाखों लोग अपने घर से बेघर हो गए हैं। सबसे अधिक वीभत्स स्थिति भारत के पूर्वोत्तर राज्यों एवं उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में है। कई इलाकों का अपने सीमावर्ती क्षेत्रों से संपर्क बिल्कुल टूट चुका है, जिसकी वजह से राहत एवं बचाव कार्य में अत्यधिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

असम की अपनी हाल की यात्रा के दौरान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर में बाढ़ प्रभावित राज्यों में राहत, पुनर्निर्माण और पुनर्वास के लिये 2,000 करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की है। साथ ही 100 करोड़ रुपए की एक समग्र निधि (corpus fund) का इस्तेमाल एक उच्च-स्तरीय समिति की स्थापना के लिये किया जाएगा, जो बाढ़ की समस्या का स्थायी समाधान खोजने पर काम करेगी।

भारत में अब तक बाढ़ से बचाव के ही रास्ते खोजे गए हैं, जबकि बाढ़ के दौरान प्रभावी प्रशासन के महत्त्व को नज़रंदाज़ किया गया है। उम्मीद है कि प्रस्तावित उच्च-स्तरीय समिति प्रभावी प्रशासन के महत्त्व को पहचानने के साथ-साथ इसे अपनाने के तरीके भी सुझाएगी।

क्यों महत्त्वपूर्ण है प्रभावी प्रशासन?

बाढ़ से संरक्षण के सर्वाधिक प्रचलित उपायों में शामिल हैं तटबंधों का निर्माण, नदियों के किनारों को मज़बूत करना और बांधों का निर्माण आदि। दरअसल, प्रत्येक वर्ष जब भी बाढ़ आती है तटबंधों का एक बड़ा हिस्सा बहा ले जाती है क्योंकि एक बार निर्माण पूरा हो जाने के बाद उसके रख-रखाव पर ध्यान नहीं दिया जाता है।

विदित हो कि तटबंध निर्माण एक खर्चीली प्रक्रिया है, परन्तु एक प्रभावी प्रशासन के द्वारा हम तटबंधों के कटाव को रोक सकते हैं। बाढ़ के दौरान बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था चरमरा सी जाती है, स्कूलों में या तो पानी भर जाता है या फिर वे बाढ़ राहत केंद्र के तौर पर कार्य कर रहे होते हैं।

बाढ़ के दौरान स्वच्छ पेय जल और स्वच्छता के मुद्दों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा, क्योंकि इस दौरान बाढ़ से प्रभावित इलाके रोग का घर बन जाते हैं।

केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने एक पत्र प्रकाशित कर शहरी सार्वजनिक विभागों एवं सरकारों के लिये ‘शहरी बाढ़़-मानक संचालन प्रक्रियाएँ’ (SOP) नामक दिशा निर्देश जारी किये जिसमें तैयारी, प्रारंभिक चेतावनी, प्रतिक्रिया एवं राहत बहाली पुनर्वास आदि विभिन्न चरणों के लिये मार्गदर्शन है। इस संबंध में प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं:

  • शहरी स्थानिय निकायों को आपातकालीन ऑपरेशन केंद्र संकट नियंत्रण कक्ष एक सूचना केंद्र स्थापित करने चाहिये। शहरी बुनियादी ढाँचे का उचित रख-रखाव एवं मरम्मत का कार्य ULBs के नियंत्रण में है अतः बाढ़ के समय भराव क्षेत्र से पानी को निकालना, निचले इलाकों की पहचान करना, सड़कों एवं नालियों की मरम्मत करना आदि कार्य समयबद्ध तरीके से होने चाहिये।
  • प्रारंभिक चरण में महामारी की रोकथाम के लिये एक आपातकालीन स्वास्थ्य संकर प्रबंधन योजना तैयार करनी चाहिये। इसमें महामारी नियंत्रण इकाई की स्थापना, दवा, उपकरण एवं रक्त के आपातकालीन स्टॉक रखना आदि शामिल है।
  • PWD को समय-समय पर नालियों की मरम्मत करनी चाहिये एवं ड्रेनेज मास्टर प्लान को अद्यतन (update) करना चाहिये। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में जल के अधिक प्रवाह से निपटने के लिये जल निकासी व्यवस्था को नया रूप देना चाहिये।
  • विद्युत विभाग को उच्च जोखिम वाले विद्युत प्रतिष्ठानों के आस-पास संवेदनशील स्थलों की पहचान करनी चाहिये तथा ट्रांसफॉर्मरों एवं सब-स्टेशनों को बाढ़ के दौरान संभावित जल स्तर से ऊपर स्थापित करना चाहिये।
  • पुलिस को कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिये आपात योजना बनानी चाहिये। इसे भीड़ को प्रबंधित करना, संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना, राहत सामग्री के वितरण की सुरक्षा आदि के लिये तैयार रहना चाहिये।

इस प्रकार, एक पूर्व निर्धारित रणनीति एवं समन्वित प्रयासों से शहरी बाढ़ की बारंबार होने वाली घटनाओं से निपटा जा सकता है।

प्रमुख तथ्य:

विश्व बैंक के एक ताजा आलेख के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए तकनीकी रूप से ज्यादा सक्षम होने के बावजूद 1980 के दशक की तुलना में इससे हर साल होने वाला नुकसान 4 गुना हो गया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को 1980 के दशक में जहां औसतन 50 अरब डॉलर सालाना की चपत लगती थी, वहीं पिछले 1 दशक में यह बढ़कर 200 अरब डॉलर हो गई है।

केंद्र के आँकड़ों के अनुसार, भारत में पिछले चार सालों में बाढ़ से प्रत्येक वर्ष 1,000 से 2,100 लोगों की मौत हुई है, जबकि फसल और अन्य सार्वजनिक नुकसान एक वर्ष में 33,000 करोड़ रुपए रहा है।

हमें निरंतर आर्थिक विकास के लिये दोनों मोर्चों पर कार्रवाई की आवश्यकता है। एक ज़ोरदार मानसून अर्थव्यवस्था के लिये महत्त्वपूर्ण तो है ही, परंतु सरकारों को अधिक वर्षा के दुष्परिणामों से निपटने के लिये भी तैयार रहना चाहिये।

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