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भारत में प्रदूषण की वजह से सबसे अधिक मौतें: लैंसेट रिपोर्ट

भारत में प्रदूषण की वजह से सबसे अधिक मौतें: लैंसेट रिपोर्ट

साल 2015 में भारत में प्रदूषण जनित बीमारियों के चलते 25 लाख से ज्यादा लोगों को समय से पहले अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इसी साल दुनिया भर में प्रदूषण से मौतों के मामले में भारत पहले स्थान पर रहा। प्रदूषण जनित ये बीमारियां हवा, पानी और अन्य तरह के प्रदूषण से जुड़ी थीं। प्रख्यात मेडिकल जर्नल लैंसेट में छपे एक ताजा अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। यह रिपोर्ट 19 अक्टूबर 2017 को जारी की गई।

प्रमुख तथ्य:

अध्ययन के मुताबिक 2015 में दुनिया भर में 90 लाख लोग प्रदूषण जनित बीमारियों के शिकार हुए। इनमें से 28 फीसदी लोग भारत के थे। इनमें से वायु प्रदूषण के चलते मरने वालों की संख्या 18 लाख से ज्यादा (1.81 मिलियन) थी, जबकि जल प्रदूषण के चलते 6 लाख से ज्यादा (0.64 मिलियन) लोग मौत के मुंह में समा गए।

अध्ययन के मुताबिक वैश्विक स्तर पर निम्न और मध्यम आय वाले देशों के अलावा औद्योगीकरण की राह पर तेजी से बढ़ते देशों जैसे भारत, चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मेडागास्कर और केन्या भी व्यापक तौर पर इन बीमारियों से प्रभावित हैं।

लैंसेट की सूची में चीन का नंबर भारत के बाद आता है। 2015 में चीन में 18 लाख लोग प्रदूषण जनित बीमारियों के शिकार हुए हैं। इन बीमारियों में दिल की बीमारी, हृदयाघात, फेफड़े का कैंसर और क्रोनिक ऑब्सट्रैक्टिव पल्मोनरी जैसी बीमारी मुख्य है।

रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में वायु प्रदूषण के चलते सबसे ज्यादा लोग बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। वायु प्रदूषण के चलते 2015 में 65 लाख लोग बीमारियों की चपेट में आए, जबकि 18 लाख जल प्रदूषण और 8 लाख लोग अन्य तरह के प्रदूषण जनित बीमारियों के शिकार हुए।

इस सूची में भारत के बाद दूसरे नंबर पर चीन रहा, जिसके 15.8 लाख लोग वायु प्रदूषण जनित बीमारियों के शिकार हुए। इसके बाद पाकिस्तान (2.2 लाख), बांग्लादेश (2.1 लाख) और रूस (1.4 लाख) का नंबर रहा, जहां तक जल प्रदूषण की बात है नाइजीरिया (1.6 लाख) और पाकिस्तान (74 हजार) का नंबर भारत के बाद आता है।

लैंसेट मेडिकल जर्नल की तरफ से जारी एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2015 में हर 6 में से 1 मौत प्रदूषण की वजह से हुई। इनमें से ज्यादातर मौतें भारत जैसे देश में हुई हैं। रिपोर्ट के अनुसार वैश्वीकरण के साथ खनन और उत्पादन का काम पिछड़े देशों में किया जा रहा है, जहां पर पर्यावरण को लेकर बने नियम कड़े नहीं हैं और नियमों को ठीक से लागू नहीं किया जाता।

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