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ईरान परमाणु समझौते को समझें

ईरान परमाणु समझौते को समझें:

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 08 मई 2018 को ईरान के साथ हुए ऐतिहासिक परमाणु समझौते से अमेरिका के अलग होने की घोषणा की थी। पूर्व राष्ट्रपति ओबामा के समय के इस समझौते की ट्रंप पहले ही कई बार आलोचना कर चुके थे।

ट्रंप ने इस बात की भी घोषणा की कि परमाणु समझौते से पहले ईरान पर जो प्रतिबंध लगाए गए थे, उसे दोबारा लागू कर दिया गया है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर कोई देश "ईरान की मदद करता है तो अमरीका उस पर भी प्रतिबंध लगाएगा।"

हालाँकि यूरोपीय संघ ने ईरान को भरोसा दिलाया है कि वो ईरान के साथ हुए परमाणु करार पर कायम रहेगा। क्रियान्वयन संयुक्त व्यापक योजना (जेसीपीओए) के नाम से जाने जाने वाले परमाणु समझौते को बचाने के ईयू के प्रयास दर्शाते हैं कि यह समझौता इस क्षेत्र और पूरी दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम:

ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1950 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका की मदद से शांति के लिए परमाणु कार्यक्रम (Atoms for Peace program) के रूप में शुरू किया गया था। ईरान के परमाणु कार्यक्रम में संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों की भागीदारी 1979 ईरानी क्रांति (ईरान के शाह की विदाई) तक जारी रही।

वर्ष 2002 में एक विपक्षी गुट द्वारा अघोषित परमाणु केन्द्रों के खुलासे के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय में ईरान के परमाणु कार्यक्रम के प्रति चिंता बढ़ने लगी। वर्ष 2006 से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ईरान के विवादास्पद परमाणु कायक्रम के मद्देनजर उस पर कुल चार दौर के प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पारित किया। इसके अतिरिक्त संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ ने भी ईरान पर तेल निर्यात एवं व्यापार संबंधी कई प्रतिबंध लगाये।

जून 2013 के राष्ट्रपति चुनावों के विजेता हसन रूहानी ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगे प्रतिबंधों को हटाने और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ कूटनीतिक समझौते तक पहुंचने की आवश्यकता पर बल दिया। 15 अक्टूबर 2013 को ईरान और छह मध्यस्थ देशों के बीच वार्ता की शुरुआत हुई।

क्रियान्वयन संयुक्त व्यापक योजना:

ईरान और पी-5+1 देश (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, रूस और जर्मनी) ईरान के परमाणु कार्यक्रम समझौते पर 14 जुलाई 2015 को सहमत हुए। यह ऐतिहासक समझौता आस्ट्रिया की राजधानी वियना के रिजी पैलेस कोबर्ग होटल में हुआ।

इस समझौते को ‘क्रियान्वयन संयुक्त व्यापक योजना’ (Joint Comprehensive Plan of Action, JCPA) या ‘वियना समझौता’ नाम दिया गया। यह समझौता वियना में करीब 17 दिनों तक चली सात देशों के विदेश मंत्रियों की चर्चा के बाद हुआ।

ईरान का परमाणु समझौता:

ईरान में दो जगहों, नाटांज और फोर्डो में यूरेनियम का संवर्धन किया जाता है। जिसका उपयोग परमाणु ऊर्जा के लिए किया जाता है। इसका उपयोग परमाणु हथियारों को विकसित करने के लिए किया जा सकता है। जुलाई 2015 में ईरान के पास 20 हज़ार ऐसे मशीनी केंद्र थे, जहां यूरेनियम के रासायनिक कणों को अलग किया जाता था।

जेसीपीए के तहत इसकी संख्या 5,060 तक सीमित करने को कही गई थी। ईरान ने वादा किया था कि वो अपने यूरेनियम का भंडार 98 फीसदी तक घटाकर 300 किलोग्राम तक करेगा। जनवरी 2016 में ईरान ने यूरेनियम केंद्रों की संख्या कम की और सैंकड़ों किलोग्राम लो-ग्रेड यूरेनियम रूस भेजा था।

समझौते के तहत शोध और विकास के कार्यक्रम सिर्फ नाटांज में अधिकतम आठ सालों तक किया जा सकेगा। वहीं, फोर्डो में अगले 15 सालों तक इस पर रोक लगाने की बात कही गई है।

http://bit.ly/2LcILIs

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