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प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत 138वें स्थान पर

प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत 138वें स्थान पर:

प्रेस स्वतंत्रता के मामले में भारत की स्थिति 4 साल के सबसे खराब स्तर पर पहुंच गई है। 25 अप्रैल 2018 को दुनिया के 180 देशों के लिए प्रेस फ्रीडम इंडेक्स जारी किया गया। इस इंडेक्स में भारत का 138वां स्थान है।

इससे पहले भारत की इतनी बुरी रैंकिंग 2013 और 2014 में थी। तब भारत 140 नंबर पर था। 2017 में भारत 136वें पायदान पर पहुंच गया था। पाकिस्तान इस रैंकिंग में भारत से एक पायदान नीचे 139 नंबर पर है। 2017 में भी पाकिस्तान इसी पायदान पर था।

रिपोर्ट के प्रमुख तथ्य:

  • इंडेक्स में नॉर्वे लगातार दूसरे साल पहले नंबर पर बरकरार है। इससे पहले 2007 से 2012 तक नॉर्वे लगातार शीर्ष पर रहा था। अब तक जारी हुई कुल 16 रैंकिंग में से 11 बार नॉर्वे ही नंबर एक रहा है। ब्रिटेन 40वें और अमेरिका 45वें स्थान पर है।
  • उत्तर कोरिया में प्रेस की आवाज को सबसे ज्यादा दबाया जाता है। चीन इस इंडेक्स में 175वें स्थान पर है।
  • ये रैंकिंग फ्रांस के एक एनजीओ “रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (आरडब्ल्यूबी) ने जारी की है। आरडब्ल्यूबी पिछले 16 साल से यानी 2002 से प्रेस फ्रीडम इंडेक्स जारी कर रहा है।
  • रिपोर्ट में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या और मार्च 2018 में 3 पत्रकारों की हत्या का भी जिक्र है।
  • रिपोर्ट में विश्व में मीडिया की कमजोर होती स्थिति के लिए अमेरिका, रूस और चीन को जिम्मेदार ठहराया गया है। अमेरिका चुनाव में रूसी दखल और चीन में मीडिया पर लगी पाबंदियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।
  • चीन मीडिया कंट्रोल मॉडल पर चल रहा है। सबसे ज्यादा चिंता वाली बात ये है कि दुनिया के बड़े-बड़े देशों में जो नेता जनता के बीच में से चुनकर आ रहे हैं, वो भी मीडिया को पनपने नहीं देना चाहते।

भारत की गिरती रैंकिंग के प्रमुख कारण:

रिपोर्ट के अनुसार, भारत की इस गिरती रैंकिंग के लिए घृणा अपराध भी एक बड़ा कारण है। जब से नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बने हैं, चरमपंथी पत्रकारों से बहुत हिंसक तरीके से पेश आ रहे हैं।

आरएसएफ ने इसके लिए पत्रकार और कार्यकर्ता गौरी लंकेश का उदाहरण दिया, जिनकी पिछले साल सितंबर में हत्या कर दी गई थी। भारत की गिरती रैंकिंग के लिए पत्रकारों के खिलाफ होने वाली हिंसा बहुत हद तक जिम्मेदार है।

उनके काम के चलते कम से कम तीन पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया गया। ज्यादातर मामलों में अस्पष्ट स्थितियों में उनकी मौत हुई और अक्सर ऐसे मामले ग्रामीण इलाकों में देखने को मिलते हैं जहां संवाददाताओं को बहुत कम मेहनताना मिलता है।

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