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पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 को लेकर प्रदर्शन

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 को लेकर प्रदर्शन:

पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 को लेकर जारी असंतोष का समर्थन करते हुए 21 मई 2018 को बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए।

अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नगालैंड में छात्र संघों के सर्वोच्च निकायों ने अपने-अपने राज्यों की राजधानी में इस प्रस्तावित विधेयक को तत्काल वापस लेने की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने अपने राज्यों के राज्यपालों को ज्ञापन सौंपकर उनसे मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की।

विवाद:

नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन के लिए लोकसभा में नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 पेश किया गया। विधेयक के एक अहम संशोधन का मकसद भारत में 6 साल रहने के बाद अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदायों को नागरिकता देना है।

केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में ‘नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016’ पेश किया था। यह विधेयक 1955 के उस ‘नागरिकता अधिनियम’ में बदलाव के लिए लाया गया था जिसके तहत किसी भी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय होती है। इस नए विधेयक का सबसे विवादास्पद प्रावधान ‘अवैध प्रवासियों’ की परिभाषा में बदलाव से जुड़ा है।

1955 का कानून कहता है कि किसी भी ‘अवैध प्रवासी’ को भारतीय नागरिकता नहीं दी जा सकती। इस कानून के तहत ‘अवैध प्रवासी’ की परिभाषा में दो तरह के लोग आते हैं। पहले, वे विदेशी जो बिना वैध पासपोर्ट या अन्य यात्रा दस्तावेजों के भारत आए हैं और दूसरे वे विदेशी जो वीसा एक्सपायर होने या अनुमत समय (परमिटेड टाइम) बीतने के बाद भी भारत में रुके हुए हैं।

जुलाई में लाया गया संशोधन ‘अवैध प्रवासी’ की इस परिभाषा में बदलाव करते हुए कहता है कि ‘अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पकिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौध, जैन, पारसी और ईसाई लोगों को ‘अवैध प्रवासी’ नहीं माना जाएगा।’ दूसरी तरह से देखें तो यह संशोधन सिर्फ पड़ोसी देशों से आने वाले मुस्लिम लोगों को ही ‘अवैध प्रवासी’ मानता है जबकि लगभग अन्य सभी लोगों को इस परिभाषा के दायरे से बाहर कर देता है।

जिन लोगों को नया विधेयक ‘अवैध प्रवासी’ की परिभाषा से बाहर करता है, उन्हें देशीकरण (नेचुरलाइजेशन) के जरिये भारतीय नागरिकता हासिल करने में भी छूट देता है। इस प्रक्रिया के जरिये अभी नागरिकता का आवेदन तभी किया जा सकता है जब कोई व्यक्ति 12 साल से देश में रह रहा हो।

लेकिन नया संशोधन इन तमाम लोगों को छह साल बाद ही नागरिकता के लिए आवेदन करने की छूट देता है। यानी नया कानून बनने के बाद अगर पाकिस्तान या बांग्लादेश से कोई हिंदू अवैध तरीके से भी देश की सीमा के अंदर घुस आता है तो छह साल बाद वह यहां की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकता है।

आरोप लग रहे हैं कि यह संशोधन दूसरे देशों से आने वाले सिर्फ मुसलमानों के साथ ही भेदभाव करता है। जबकि अन्य धर्मों को मानने वालों को शरणार्थी मानता है और उन्हें नागरिकता देने की भी बात करता है।

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