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विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस: 17 जून

विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस: 17 जून

वैश्विक स्तर पर मरुस्थलीकरण के प्रति जागरूकता फ़ैलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 1995 से प्रत्येक वर्ष 17 जून को विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस मनाया जाता है। मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम रियो डी जेनेरियो पर्यावरण शिखर सम्मेलन और स्थायी विकास एजेंडे (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स) का भी हिस्सा है।

थीम: वर्ष 2018 के लिए विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस की थीम "लैंड हैज ट्रू वैल्यू - इन्वेस्ट इन इट" है।

मरुस्थलीकरण (डेजर्टिफिकेशन):

मरुस्थलीकरण भूमि अपरदन की ऐसी परिघटना है जिसमें प्राकृतिक क्षमता और पारिस्थितिकी पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। यह आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था को परिवर्तित कर लोगों की जीविका पर संकट खड़ा करती है।

भारत में मरुस्थलीकरण की समस्या और इससे संबंधित कार्यक्रम:

एशियाई देशों में मरुस्थलीकरण पर्यावरण सम्बन्धी एक प्रमुख समस्या है। भारत में निर्जल भूमि के अन्तर्गत गर्म जलवायु वाले शुष्क, अर्द्ध-शुष्क और अर्द्ध-नम क्षेत्र शामिल हैं। इनका कुल क्षेत्रफल 20.3 करोड़ हेक्टेयर यानी कुल भौगोलिक क्षेत्र का 61.9 प्रतिशत है।

भारत में जनसंख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। सीमित भूमि तथा जल संसाधनों के बावजूद जमीन की मांग बढ़ रही है। कई नए उद्योग यहाँ खुल रहे हैं जिनसे वातावरण में, जमीन पर और पानी में जहरीले पदार्थ छोड़े जा रहे हैं। इन सब का कुल नतीजा यह हुआ है कि मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया लगातार जारी है।

इतना ही नहीं, मौसम की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र में जमीन की उत्पादन क्षमता घट रही है। भारत सरकार के हाल के एक अनुमान के अनुसार देश के कुल भू-क्षेत्र के 32.7 प्रतिशत (करीब 10.74 करोड़ हेक्टेयर) पर जमीन के खराब होने की विभिन्न प्रक्रियाओं का असर पड़ा है।

मरुस्थलीयकरण का सबसे पहला शिकार पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ होती हैं। प्राकृतिक वनस्पतियों का नाश मरुस्थलों के प्रसार का प्रमुख कारण है। जमीन पर बढ़ते दबाव से पेड़-पौधों और वनस्पतियों के ह्रास में खतरनाक वृद्धि हो रही है।

नियन्त्रण के उपाय:

रक्षक पट्टी वृक्षारोपण: रेतीली जमीन और हवा की तेज रफ्तार (जो गर्मियों में 70-80 कि.मी. प्रतिघंटा तक पहुँच जाती है) की वजह से खेती वाले समतल इलाकों में काफी मिट्टी का कटाव होता है। कई बार तो मिट्टी का क्षरण 5 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुँच जाता है।

सिंचाई के पानी का सही इस्तेमाल: मरुस्थलीकरण को रोकने में सिंचाई की महत्त्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ लगाने तथा उनके विकास में सिंचाई बड़ी उपयोगी साबित होती है।

खनन गतिविधियों में नियन्त्रण: इस समय बंद हो चुकी खानें या तो बंजर पड़ी हैं या उन पर बहुत कम वनस्पतियाँ (5 से 8 प्रतिशत) हैं। इन्हें फिर से हरा-भरा करने की जरूरत है।

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